
वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में शनिवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य आदरणीय डॉ. कृष्णगोपाल जी के गरिमामय आगमन के अवसर पर भारतीय प्राचीन शिक्षा व्यवस्था एवं उसके बहुआयामी ज्ञान-विज्ञान पर केन्द्रित एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक विमर्श सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर डॉ. कृष्णगोपाल जी ने लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व की भारतीय शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप, उसकी वैज्ञानिक दृष्टि तथा वैश्विक महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्राचीन भारत न केवल आध्यात्मिक चेतना का केन्द्र था, अपितु वह व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक ज्ञान की दृष्टि से भी विश्व का पथप्रदर्शक रहा है।
उन्होंने इस तथ्य पर विशेष बल दिया कि आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय ज्ञान परम्परा के इन प्रामाणिक पक्षों को ठोस सन्दर्भों, शास्त्रीय प्रमाणों एवं अनुसंधानात्मक दृष्टि के साथ वैश्विक पटल पर प्रस्तुत किया जाए।
डॉ. कृष्णगोपाल जी ने विश्वविद्यालयीय आचार्यों के साथ व्याकरण एवं भाषाशास्त्र, स्थापत्य एवं नगर नियोजन, भवन निवेश एवं निर्माण विज्ञान, पाकशास्त्र, रसायन विज्ञान, वस्त्र निर्माण, धातु विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान एवं खगोल विद्या, चिकित्सा विज्ञान तथा गणित विद्या जैसे विविध विषयों पर गहन विमर्श किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन सभी विषयों में प्राचीन भारत की उपलब्धियाँ केवल सैद्धान्तिक नहीं थीं, बल्कि वे व्यावहारिक, प्रयोगसिद्ध एवं समाजोपयोगी थीं।
उन्होंने विश्वविद्यालय के विद्वान आचार्यों से आग्रह किया कि वे इन विषयों पर प्रामाणिक ग्रन्थों, शास्त्रीय परम्पराओं, पुरातात्त्विक साक्ष्यों एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर गहन शोधकार्य करें तथा भारतीय बौद्धिक वैभव को विश्व समुदाय के समक्ष आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करें।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का सम्यक् उद्घाटन न केवल राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय है, बल्कि यह मानवता के समग्र कल्याण से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने डॉ. कृष्णगोपाल जी का हार्दिक स्वागत करते हुए कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक प्रस्तुतीकरण के लिए निरन्तर प्रतिबद्ध है। उन्होंने आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय के आचार्यगण एवं शोधार्थी प्राचीन भारतीय विज्ञान, तकनीक एवं शिक्षा पद्धति पर संगठित एवं दीर्घकालिक शोध के माध्यम से इस दिशा में सार्थक योगदान देंगे।
इस महत्त्वपूर्ण विमर्श में विष्णु स्वामी सम्प्रदाय के सतुआ बाबा पीठ के पीठाधीश्वर श्री संतोष दास बाबा,प्रो रामपूजन पाण्डेय, प्रो जितेन्द्र कुमार, प्रो रमेश प्रसाद, प्रो राजनाथ, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. दिव्यचेतन ब्रह्मचारी, डॉ. मधुसूदन मिश्र तथा डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा सहित विश्वविद्यालय के अनेक वरिष्ठ आचार्यगण एवं विद्वान उपस्थित रहे। सभी ने भारतीय प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की वैज्ञानिकता एवं उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि भारतीय शिक्षा एवं ज्ञान परम्परा के गौरवशाली अध्यायों को शोध, विमर्श एवं वैश्विक संवाद के माध्यम से पुनः प्रतिष्ठित किया जाएगा।जिससे भारत पुनः विश्वगुरु के अपने प्राचीन दायित्व का निर्वहन कर सके।
