अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में दो दिवसीय कार्यशाला शुरू 

 

वाराणसी । बुधवार को अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई) में “रिफ़ॉर्म्युलेटिंग पेडागॉजी फ़ॉर हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूशन्स (एच ई आईएस): क्रिटिकल, सस्टेनेबल, एंड ह्यूमन-सेंटर्ड टीचिंग-लर्निंग फ़्रेमवर्क्स” विषय पर एक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी द्वारा मंगलाचरण से हुई। इसके उपरांत दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. एमिली पुइग ई वलारो, प्रोफ़ेसर, डिपार्टमेंट ऑफ़ पेडागॉजी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ गिरोना, स्पेन रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी ने की। प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान) आईयूसीटीई, वाराणसी ने स्वागत उद्बोधन किया।

मुख्य अतिथि डॉ. एमिली पुइग ई वलारो, प्रोफ़ेसर, डिपार्टमेंट ऑफ़ पेडागॉजी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ गिरोना, स्पेन ने कहा कि शिक्षा केवल तरीकों में बदलाव का नाम नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, मूल्य, संदर्भ और ज़िम्मेदारी के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि आज का समय वुका और बानी परिस्थितियों से भरा हुआ है, जिसमें अस्थिरता, अनिश्चितता, जटिलता और अस्पष्टता के साथ-साथ चिंता और असंगतता भी शामिल हैं। कार्यशाला में यह विचार रखा गया कि शिक्षा को इन चुनौतियों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि इनके बीच जीने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को मानवीय जुड़ाव और नैतिक ज़िम्मेदारी जैसे मूल्यों को प्राथमिकता देनी होगी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि “रिफ़ॉर्म्युलेटिंग” का अर्थ केवल सुधार करना नहीं है, बल्कि वही करना है जो सबसे अधिक महत्त्व रखता है। प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान) आईयूसीटीई ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए शिक्षण-पद्धति के पुनर्गठन की महत्ता पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि आज के समय में केवल सुधार या परिवर्तन पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा को नए संदर्भों और ज़िम्मेदारियों के अनुरूप पुनः संयोजित करना आवश्यक है। उन्होंने ने स्पष्ट किया कि शिक्षण-पद्धति का पुनर्गठन ही उच्च शिक्षा को मानवीय, समग्र और समयानुकूल बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षण-अधिगम में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दृष्टिकोण शिक्षा को मानवीय और समग्र बनाने की दिशा में मार्गदर्शक है। आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि शिक्षा में संवेदनशीलता, समग्रता और मानवीय मूल्यों का समावेश हो।

इस कार्यक्रम का समन्वयन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह, सहायक आचार्य, आईयूसीटीई द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रमुख शिक्षाविद्, शोध छात्र, तथा केंद्र के अन्य समस्त संकाय सदस्य उपस्थित रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *