कुशवाहाकांत और भैयाजी बनारसी के साहित्यिक अवदान पर काशी में मंथन

 

वाराणसी। साहित्यिक संघ एवं विद्या श्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में अर्दली बाजार स्थित राजकीय पुस्तकालय में हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा की 16वीं कड़ी के अंतर्गत उपन्यासकार कुशवाहाकांत और साहित्यकार-पत्रकार भैयाजी बनारसी (मोहनलाल गुप्ता) के साहित्यिक अवदान पर व्याख्यानमाला आयोजित की गई। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत ने कहा कि कुशवाहाकांत को केवल लोकप्रिय उपन्यासकार मानना उनके व्यापक साहित्यिक व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने प्रेम, रोमांच, देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनाओं में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। वहीं सांस्कृतिक समीक्षक अरविंद मिश्रा ‘हर्ष’ ने कहा कि भैयाजी बनारसी ने काशी की पत्रकारिता और साहित्य को नई पहचान दी। उन्होंने विश्वनाथ मंदिर से जुड़े विषयों पर व्यापक लेखन किया तथा ब्रिटेन और नेपाल की यात्राओं के दौरान भी भारतीय संस्कृति का प्रभावी प्रतिनिधित्व किया। अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डॉ. दयानंद ने कहा कि भैयाजी बनारसी साहित्यिक पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे। उन्होंने नई पीढ़ी के साहित्यकारों को सदैव प्रोत्साहित किया। उन्होंने बताया कि कुशवाहाकांत ने मात्र 34 वर्ष की आयु में 35 उपन्यास लिखकर हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान बनाया तथा चिंगारी, बिजली और नागिन जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया। विद्या श्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने स्वागत किया। सरस्वती वंदना आनंद कृष्ण ‘मासूम’ ने प्रस्तुत की तथा अंत में देवेंद्रनाथ पांडेय ने काव्यपाठ किया। संचालन डॉ. आशुतोष शास्त्री और धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्रनाथ मिश्र ने किया। इस अवसर पर इस अवसर पर डॉ. राम सुधार सिंह, ओम धीरज, अशोक कुमार सिंह, पवन कुमार शास्त्री, अत्रि भारद्वाज, डॉ. श्रद्धानंद, शिवकुमार पराग, गिरिजेश तिवारी, शशिकला पांडेय, उमाशंकर तिवारी ‘कंचन’, गणेश गंभीर सहित अनेक साहित्यकार, कवि और लेखक उपस्थित रहे।

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