
वाराणसी। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘समर-यात्रा’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक चेतना और गांधीवादी दर्शन का सशक्त दस्तावेज है। इसमें सत्याग्रह, अहिंसा और जनशक्ति की प्रभावशीलता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह बात प्रो. श्रद्धानंद ने रविवार को लमही स्थित प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट की ओर से आयोजित साप्ताहिक साहित्यिक श्रृंखला ‘सुनो मैं प्रेमचंद’ के 1994वें आयोजन में कही।
उन्होंने कहा कि ‘समर-यात्रा’ केवल राजनीतिक संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस नैतिक चेतना का चित्रण है जिसने भारतीय समाज को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दी। कहानी का केंद्र एक सत्याग्रही दल की यात्रा है, जिसका उद्देश्य देशवासियों में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सामाजिक जागरण का संदेश फैलाना है। प्रेमचंद ने इस यात्रा को संघर्ष, आत्मबल और जनजागरण के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।
कार्यक्रम में प्रेमचंद की कहानी ‘बहिष्कार’ का प्रभावपूर्ण पाठ रजनीश कुमार ने किया। साहित्यिक विमर्श के दौरान वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर भी अपने विचार रखे और कहा कि उनकी रचनाएं आज भी समाज को नैतिकता, समानता और मानवीय मूल्यों का संदेश देती हैं।
कार्यक्रम में स्थानीय साहित्यप्रेमियों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। संचालन आयुषी दूबे ने किया। रोहित गुप्ता ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन मनोज विश्वकर्मा ने प्रस्तुत किया।












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