जनकनंदिनी’ का लोकार्पण, महाकाव्य में भारतीय संस्कृति और नारी अस्मिता का हुआ मंथन

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय, अर्दली बाजार में रविवार को विश्व हिन्दी शोध संवर्धन अकादमी एवं कविताम्बरा के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यकार हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’ रचित प्रबंध महाकाव्य ‘जनकनंदिनी’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा आयोजित हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजा राम शुक्ल ने कहा कि यह महाकाव्य रामायण की मूल कथा को समकालीन जीवन मूल्यों से जोड़ते हुए राष्ट्रीय चेतना, नारी अस्मिता और प्रकृति सौंदर्य का सशक्त चित्रण करता है। पारंपरिक छंदों और अलंकारों के प्रयोग ने कृति को विशिष्ट बनाया है। मुख्य अतिथि प्रो. कल्पलता पाण्डेय ने कहा कि महाकाव्य में राम-सीता के आदर्श संबंध, राजधर्म, कर्तव्यबोध और नारी सम्मान का प्रभावी चित्रण है। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामसुधार सिंह ने इसे त्याग, करुणा, स्वाभिमान और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का सशक्त दस्तावेज बताया। प्रो. शीतला प्रसाद दुबे, प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी तथा डॉ. संजय पंकज ने भी कृति को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं और साहित्यिक सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। स्वागत भाषण में हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’ ने कहा कि सीता भारतीय संस्कृति, धैर्य, त्याग और नारी शक्ति की सर्वोच्च प्रतीक हैं तथा इसी भावभूमि को महाकाव्य में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है। कार्यक्रम में टीकाराम आचार्य, डॉ. नसीमा निशा, डॉ. करुणा सिंह, ऋतु दीक्षित, मधुलिका राय, झरना मुखर्जी सहित शताधिक कवियों ने काव्यपाठ कर समां बांधा। संचालन डॉ. रामसुधार सिंह एवं गिरीश पाण्डेय ‘काशिकेय’ ने तथा धन्यवाद श्रीनारायण खेमका ने ज्ञापित किया।

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