असमय ही लुप्त हो गई खिड़की से झाँकती सुबह

 

वाराणसी। लोक संचेतना के कवि एवं लेखक प्रयागराज के कुलभाष्कर कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक और प्राचार्य के पद से अवकाश प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार डॉ देवीप्रसाद कुंवर ने बुधवार को प्रयागराज के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वें 74 वर्ष के थे। वे पिछले कुछ वर्षो से लिवर सिरोसिस की बीमारी से ग्रस्त थे। डॉ कुंवर ने वाराणसी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पीएच. डी के उपरांत आपने प्रयागराज को अपनी कर्मस्थली बनाया लेकिन अपनी रचनाधर्मिता को विस्तार देने के लिए काशी को ही चुना।डॉ कुंवर ने अपनी पहचान एकाएक नहीं बना ली बल्कि इसके पीछे दशकों का अनवरत लेखन रहा है। आपने समीक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का सृजन किया। जिनमें धर्मवीर भारती का कथा संसार, धर्मवीर भारती का काव्य संसार, रामेश्वर शुक्ल अंचल समग्र (पाँच खण्डों ) के अलावा आपका काव्य संग्रह ‘खिड़की से झाँकती सुबह’ तथा ललित निबंध संग्रह ‘ मंदिर दियना बार ‘ ने पाठकों के बीच खासी लोकप्रियता हासिल की थी। इसके अलावा आपने दर्जनों पुस्तकों की रचना की। वे हिंदी के सुप्रसिद्ध ललितनिबंधकार और समीक्षक ‘विद्याभूषण’ स्मृतिशेष डॉ विश्वनाथ प्रसाद के छोटे भाई थे। अक्सर गोष्ठियों में रचनाकार कहते हैं कि काशी के साहित्य में डॉ विश्वनाथ प्रसाद और डॉ देवीप्रसाद, दो साधारण भाईयों की एक असाधारण जोड़ी रही है। हिंदी साहित्य में इन दोनों भाईयों का अपने अपने ढंग से साहित्यिक योगदान है। डॉ कुंवर साहित्य में लोक अवधारणओं के कलमकार थे। हिंदी साहित्य की कई विधाओं पर अपनी संवेदनशील रचनात्मकता का ओजस्वी परिचय दिया। डॉ देवीप्रसाद कुंवर ने व्यक्ति की निजी अनुभूतियों तथा उसकी एकांतिकता को भी अपनी कुछ कविताओं की विषय वस्तु बनाया। आपने व्यक्ति के दुःख, तनाव को संवेदना के सूक्ष्म धरातल पर चित्रित किया ।अपने युग, परिवार और समाज से प्रभाव ग्रहण किया और अपनी प्रतिभा, चिंतन -मनन के आधार पर लोक को साहित्य की नई दिशा दिखाई। जो कुछ हो रहा है उसकी जानकारी तो देते ही हैं और क्या होना चाहिए इसका भी संकेत देने का प्रयास करते हैं। साहित्य के सजग प्रहरी थे। साहित्य प्रभावपूर्ण है, यथार्थ है, व्यापक है। रचनाएं अपने युग का, अपनी परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब है। अपने समय की स्थिति का विस्तार से यथार्थ चित्रण किया है।

ललितनिबंधों की भाषा सरल और व्यावहारिक है। उनकी भाषा में मनोभावों की सृष्टि की विलक्षण क्षमता है।भाषा रोचक, लुभावनी, गंभीर, प्रभावकारी, व्यंग्यात्मक भी है। आपके ललितनिबंध सभी दृष्टियों से परिपूर्ण हैं।

डॉ देवीप्रसाद कुँवार जी हिंदी साहित्य के सामर्थ्यवान रचनाकार थे । साहित्य की दुनियां डॉ कुंवर जी का काशी और प्रयाग में समान रूप से चर्चित थे । उनके साहित्य में जीवन को नज़दीक से महसूस करने और उसमें नई ऊर्जा उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता थी। काव्यसंग्रह ‘खिड़की से झाँकती सुबह’ में अधिकांश कविताएं जीवन के इर्द गिर्द ही घूमती हैं। इस संग्रह की पहली कविता ‘माँ’ को समर्पित है। जिसे पढ़ने पर एक सुखद क्षण की अनुभूति होती है –

एक बहुत सुरीली धुन में

कानों में आती आवाज

एक आकर्षक आवाज

बहुत दूर जैसे कोई मछेरा

लहरों में फंसा

उदास सी तान छेड़ बैठा हो

माँ, गा रही थीं।”

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