
वाराणसी। वाराणसी विकास प्राधिकरण के संरक्षण में सुबह-ए-बनारस द्वारा संचालित आनंद कानन कला गुरुकुल में मंगलवार को काशी कथा का आयोजन किया गया। नगवा स्थित संत रविदास पार्क में हुए काशी कथा के इस सत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पौत्री एवं नगर की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.मुक्ता ने अपनी कहानी ‘सुरो के द्विप’ का पाठ किया। उनकी कहानी बनारस घराने के एक तबला वादक परिवार और उनके शिष्यों पर केंद्रित रही।
सत्य घटना पर आधारित इस कहानी में एक कलाकार की साधना का विस्तृत वर्णन किया गया। वहीं उनके शिष्यों द्वारा की गई नाफरमानी का भी विस्तार से जिक्र किया गया। गुरु याद में होने वाले संगीत समारोह में तबला बजाने के लिए भी फीस मांगने वाले एक कलाकार को किस प्रकार अपने जीवन में चुनौतियों का सामना करना पड़ा। गुरु के प्रति द्रोह करने के कारण कैसे उनकी विद्या ने उनका साथ छोड़ दिया इस सभी पक्षों का खुलासा उन्होंने बड़ी सफाई से किया। इस कहानी का निष्कर्ष यह था कि जो गुरु से छल करते हैं वे कभी सुखी नहीं रहते। यही नहीं जब उन्हें गुरु से प्राप्त विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, उसी समय वह विद्या उनका साथ छोड़ देती है। संगीत तो वैसे भी चंचला है। जरा सी पकड़ ढीली हुई नहीं कि गई हाथ से। कहानी पाठ के बाद उसपर चर्चा हुई। काशी कथा के कलागुरु अरविन्द मिश्र ‘हर्ष’ के संचालन में हुई इस चर्चा में डॉ.अत्रि भारद्वाज, सुबह-ए- बनारस के सचिव डॉ.रत्नेश वर्मा, गायन कला गुरु पं.विजय कपूर, चित्र कला गुरु अनिल शर्मा एवं मानती शर्मा, कथक कला गुरु अमृत मिश्र, तबला के कला गुरु डॉ.प्रेमनारायण सिंह एवं पं.संदीप त्रिपाठी ने हिस्सा लिया।

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