“डॉ. आदित्यनाथ झा के जीवन-दर्शन, विद्वत्ता और दूरदृष्टि से प्रेरणा लेकर भारतीय ज्ञान-परम्परा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का संकल्प”:-प्रो जितेन्द्र कुमार

वाराणसी। मैथिल समाज, उत्तर प्रदेश और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति पद्मविभूषण डा. आदित्यनाथ झा कि 115 वीं जयंती समारोह मनाई गई। जिसकी अध्यक्षता वैज्ञानिक, कुलानुशासक प्रो जितेन्द्र कुमार ने करते हुए कहा कि आज डॉ. आदित्यनाथ झा जैसे महान व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए मन श्रद्धा और गौरव से भर उठता है। उनका जीवन केवल उपलब्धियों की गाथा नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, कर्तव्यनिष्ठा और भारतीय परम्परा के प्रति समर्पण का प्रेरक संदेश है। उन्होंने अपने ज्ञान और दूरदृष्टि से इस संस्था को नई दिशा दी और संस्कृत को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया। ऐसे महापुरुषों का स्मरण हमारे लिए अतीत को दोहराना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को आत्मसात कर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करना है। आज आवश्यकता है कि हम उनके कृतित्व से प्रेरणा लेकर विश्वविद्यालय की गौरवशाली परम्परा को और समृद्ध करें तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा को नई पीढ़ी तक आत्मीयता और प्रतिबद्धता के साथ पहुँचाएँ।

मुख्य वक्ता तुलनात्मक धर्म दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष,दर्शन संकाय प्रमुख एवं पूर्व कुलपति प्रो रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि 18 अगस्त 1911 को जन्मे डॉ. आदित्यनाथ झा अपने जीवन में अनेक क्षेत्रों में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले विलक्षण व्यक्तित्व थे। वे महान संस्कृत विद्वान सर गंगानाथ झा के सुपुत्र, प्राचार्य, आई.सी.एस. अधिकारी, मुख्य सचिव, दिल्ली के प्रथम उपराज्यपाल तथा भारतीय प्रशासनिक अकादमी, देहरादून के प्रथम निदेशक रहे और मुख्य सचिव रहते हुए सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व भी निभाया। इस संस्था के प्रथम कुलपति के रूप में उन्होंने इसे व्यापक दृष्टि प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्कृत के पंडितों को आधुनिक ज्ञान से जोड़ने के लिए अंग्रेजी विषय को भी महत्व दिया तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप आगे बढ़ाने का प्रयास किया। पिता से कुलपति का दायित्व ग्रहण करना उनके लिए केवल पदभार नहीं, बल्कि पितृऋण चुकाने जैसा भाव था। उनके बहुआयामी लेखन, विद्वत्ता, प्रशासनिक कुशलता और दूरदृष्टि ने विश्वविद्यालय की नींव को सुदृढ़ किया। 18 जनवरी 1972 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी विश्वविद्यालय के लिए गौरव और प्रेरणा का स्रोत है

विशिष्ट अतिथि प्रो हरिप्रसाद अधिकारी ने बतौर वक्ता कहा कि विश्वविद्यालय की समृद्ध परम्परा को अपने ज्ञान, व्यक्तित्व और कर्तृत्व से गौरवान्वित करने वाले आचार्यों का स्मरण आवश्यक है। विशेषकर आदित्यनाथ झा जैसे विशिष्ट कुलपतियों की जन्म-जयंती मनाकर हम उनके योगदान और प्रेरणादायी व्यक्तित्व को नई पीढ़ी तक पहुँचा सकते हैं।

सारस्वत अतिथि प्रो सुधाकर मिश्र ने कहा कि आचार्यों की विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के वे विशिष्ट आचार्य, जिन्होंने कुलपति के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी है, उनकी जन्म-जयंती अवश्य मनाई जानी चाहिए। आदित्यनाथ झा जैसे विद्वान, दूरदर्शी और अनुकरणीय व्यक्तित्व का स्मरण विश्वविद्यालय की गौरवशाली परम्परा और भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

छात्रकल्याण संकायाध्यक्ष प्रो शैलेश कुमार मिश्र ने कहा कि

इस महान व्यक्तित्व आदित्य नाथ झा का स्मरण करते हुए कहा कि इस संस्था के निर्माण और विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी विश्वविद्यालय के लिए प्रेरणास्रोत है।

मैथिली समाज द्वारा पारंपरिक रूप से प्रो जितेन्द्र कुमार, प्रो रजनीश कुमार,प्रो सुधाकर मिश्र,प्रो हरिप्रसाद अधिकारी, महेन्द्र पाण्डेय,प्रो शैलेश कुमार मिश्र,प्रो विजय कुमार पाण्डेय,प्रो दिनेश कुमार गर्ग,प्रो अमित कुमार शुक्ल, डॉ मधुसूदन मिश्र, एवं जनसम्पर्क अधिकारी शशीन्द्र मिश्र अभिनंदन किया गया।

मंगलाचरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं स्वागत और अभिनंदन किया गया। सह संयोजन/संचालन एवं विषय उपस्थापन डॉ कमलेश कुमार झा तथा धन्यवाद ज्ञापन गौतम कुमार झा,(एडवोकेट) ने किया।

स्वागत संस्था के अध्यक्ष निरसन कुमार झा ने किया।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो हरिप्रसाद अधिकारी प्रो विधु द्विवेदी,प्रो सुधाकर मिश्रा,प्रो विजय पाण्डेय,प्रो दिनेश कुमार गर्ग,प्रो अमित कुमार शुक्ल, डॉ विशाखा शुक्ला, डॉ मधुसूदन मिश्र, गौतम झा, निरसन कुमार झा आदि लोग शामिल थे।

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