
वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में विश्वविद्यालय के संस्थापक, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं काशी के गौरव पुण्यश्लोक पं. कमलापति त्रिपाठी की 121वीं जयंती ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर श्रद्धा एवं गरिमा के साथ मनाई गई। योग साधना केन्द्र में आयोजित समारोह में उनके राष्ट्रसेवा, संस्कृत-संरक्षण, शिक्षा, संस्कृति एवं लोकमंगल से जुड़े बहुआयामी कृतित्व का स्मरण करते हुए उनकी सांस्कृतिक दृष्टि और अधूरे संकल्पों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया।
समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या के कुलपति एवं प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. बिजेन्द्र सिंह रहे, जबकि अध्यक्षता सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने की।
मुख्य अतिथि डॉ. बिजेन्द्र सिंह ने पं. कमलापति त्रिपाठी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी का जीवन राष्ट्र, समाज, शिक्षा और संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रेरक अध्याय है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता, विचारशील लेखक, पत्रकार और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के सजग प्रहरी थे।
उन्होंने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी ने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के माध्यम से संस्कृत शिक्षा, भारतीय ज्ञान-परम्परा तथा सनातन धर्म-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को संस्थागत आधार प्रदान किया। उनके द्वारा स्थापित यह विश्वविद्यालय आज भी उनकी सांस्कृतिक दृष्टि और दूरदर्शिता का जीवंत प्रतीक है।
डॉ. सिंह ने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी का कृतित्व शिक्षा और संस्कृति तक सीमित नहीं था। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन के विकास, सड़कों एवं नहरों के विस्तार सहित अनेक लोककल्याणकारी कार्यों के माध्यम से उन्होंने काशी और पूर्वांचल के विकास को नई दिशा प्रदान की। उनका जीवन राष्ट्रसेवा, विकास-दृष्टि, शिक्षा, संस्कृति और लोकमंगल के समन्वय का अनुपम उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि आज पं. कमलापति त्रिपाठी को स्मरण करने का सर्वोत्तम मार्ग यही है कि हम उनके विचारों को वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनाएं और राष्ट्र एवं संस्कृति के प्रति अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर पं. कमलापति त्रिपाठी का स्मरण अपने आप में अत्यन्त सार्थक है। उन्होंने आधुनिक युग में भी ऋषि-परम्परा के अनुरूप साधना, त्याग, तपश्चर्या, चिंतन और लोकमंगल को अपने जीवन का आधार बनाया।
उन्होंने कहा कि काशी की पावन धरती पर जन्मे पं. कमलापति त्रिपाठी के व्यक्तित्व में काशी की ज्ञान-साधना और सांस्कृतिक चेतना का सहज समन्वय दिखाई देता है। वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे कुशल राजनेता होने के साथ-साथ प्रखर लेखक, पत्रकार, विचारक, भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों के सजग प्रहरी तथा दूरदर्शी राष्ट्रसेवी भी थे।
कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि पं. कमलापति त्रिपाठी का व्यक्तित्व राजनीति को लोकसेवा से, शिक्षा को संस्कार से और संस्कृति को राष्ट्रचेतना से जोड़ने वाला व्यक्तित्व था। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सत्ता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह समाज, राष्ट्र और लोकमंगल के लिए समर्पित हो।
उन्होंने कहा कि संविधान सभा में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कराने तथा भारतीय गणतंत्र के नामकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर पं. कमलापति त्रिपाठी की उल्लेखनीय भूमिका रही। शिक्षा और संस्थान-निर्माण के माध्यम से उन्होंने संस्कृत, भारतीय ज्ञान-परम्परा और सनातन संस्कृति के संरक्षण को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि महापुरुषों की जयन्तियाँ केवल स्मरण के अवसर नहीं, बल्कि उनके संकल्पों के पुनरावलोकन और उन्हें अपने कर्म में उतारने के अवसर होती हैं। पं. कमलापति त्रिपाठी ने संस्कृत और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के जिस महत् उद्देश्य के लिए संस्थान-निर्माण किया, उसे नई ऊर्जा और नई दृष्टि के साथ आगे बढ़ाना वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है।
उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा को समझने और विश्व के समक्ष उसकी ज्ञानपरम्परा को प्रतिष्ठित करने में संस्कृत की भूमिका केंद्रीय है। संस्कृत विश्वविद्यालयों को केवल परम्परा के संरक्षण तक सीमित न रहकर भारतीय ज्ञान-परम्परा, आधुनिक प्रौद्योगिकी, नवाचार और वैश्विक ज्ञान-संवाद के सेतु के रूप में विकसित करना होगा। यही पं. कमलापति त्रिपाठी के प्रति हमारी सार्थक श्रद्धांजलि होगी।
समारोह में विश्वविद्यालय की परम्परा के अनुरूप मंचस्थ अतिथियों का चन्दन, माला, अंगवस्त्र एवं नारिकेल से स्वागत एवं अभिनन्दन किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य प्रो. जितेन्द्र कुमार एवं प्रो. सुधाकर मिश्र का भी माला, अंगवस्त्र एवं नारिकेल अर्पित कर सम्मान किया गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रो. महेन्द्र पाण्डेय द्वारा वैदिक मंगलाचरण तथा श्री नीतीश ठाकुर द्वारा पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात् दीपप्रज्वलन किया गया तथा पं. कमलापति त्रिपाठी एवं माँ सरस्वती के चित्र पर मंचस्थ अतिथियों द्वारा माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की गई।
विश्वविद्यालय के प्रकाशन संस्थान के निदेशक एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. अमित कुमार शुक्ल ने वाचिक स्वागत करते हुए पं. कमलापति त्रिपाठी के जीवन-वृत्त, उनके बहुआयामी कृतित्व तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के निर्माण में उनके ऐतिहासिक योगदान पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मधुसूदन मिश्र ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. दिनेश कुमार गर्ग ने किया।
जयन्ती समारोह के क्रम में अपराह्न 1:30 बजे प्रकाशन संस्थान परिसर में पं. कमलापति त्रिपाठी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। उनकी पुण्यस्मृति को पर्यावरण संरक्षण और लोकमंगल से जोड़ते हुए अतिथियों द्वारा पाँच पौधों का रोपण किया गया। इस अवसर पर प्रकृति-संरक्षण और भावी पीढ़ी के लिए हरित भविष्य के निर्माण का संदेश दिया गया।
समारोह के अन्त में उपस्थित अतिथियों, आचार्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक रूप से राष्ट्रगान किया गया। राष्ट्रगान के साथ समारोह का गरिमापूर्ण समापन हुआ।
इस अवसर पर कुलसचिव राकेश कुमार, प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. महेन्द्र पाण्डेय,विजय शंकर पाण्डेय, प्रो. विधु द्विवेदी, प्रो. विजय कुमार पाण्डेय, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. विजेन्द्र आर्य, डॉ. नितिन आर्य, डॉ. उमापति उपाध्याय सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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