(मालवीय जयंती पर विशेष)

 

मालवीय जी के अंतरात्मा में सात्विक तप के सभी सद्गुण विद्यमान थे । वे भागवतग गीता में वर्णित कायिक , वाचिक और मानसिक तप के साधन थे। वे सभी प्रकार के छंदों को सहन करते हुए निष्काम भाव से फल की इच्छा त्याग कर साम – दाम से संपन्न होकर श्रद्धा और धैर्य के साथ मन , वाणी और शरीर में प्राणी मात्र की सेवा में सदा संलग्न रहना ही उनकी दिनचर्या थी । काम – क्रोध , लोभ – मोह से बचना , सदा शुद्ध संकल्पयुक्त रहना , किसी विषय वृत्ति के कारण विछिप्त हो जाने पर उस पर विजय प्राप्त करना , व्यवहार काल में छल , कपट , धोखा और फरेब से अपने को दूर रखना उनका मानसिक तप था। असत्य , दु:खदाई ,अप्रिय और खोटे शब्दों का त्याग तथा , प्रिय सत्य और मधुर शब्दों का प्रयोग उनका वाचिक तप था । दूसरों की सहायता और सेवा करना , देश और जाति के लिए अपने शरीर के दु:ख और कष्ट की परवाह न करना उनका शारीरिक तप था ।

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय उच्च कोटि के देशभक्त थे। वे सभी प्रकार के दु:खों को सहन करते हुए तथा अनेक प्रकार के बाधाओ का सामना करते हुए हमेशा देश की सेवा में तत्पर रहते थे। देश की स्वतंत्रता , राष्ट्र के गौरव की वृद्धि तथा जनता का सर्वांगीण उत्कर्ष उनके देश सेवा के प्रमुख लक्ष्य थे। वे सभी जातियों , संप्रदायों और प्रान्तों के भारतीयों को मिलाकर भारतीय राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे। वह एक साथ एक ही समय में विभिन्न प्रकार की सेवा कार्यों में संलग्न रहते थे। जो की आज काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में परिणित है ।

मालवीय जी का जन्म स्थान इलाहाबाद था इसके बावजूद वे काशी को अपना कर्मस्थली बनाएं और यहां ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे जहां पर एक साथ दस हजार छात्र शिक्षा ग्रहण करें ।

मालवीय जी का कार्य क्षेत्र बहुत ही विस्तृत एवं व्यापक था । समाज सेवा के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य किए । सनातन धर्म का प्रचार – प्रसार , प्राचीन संस्कृति का समर्थन , हिन्दू हितों की रक्षा , हिंदी का प्रसार , देश की स्वतंत्रता , गांव की सेवा , सामाजिक कुरीतियों का विरोध , स्वयं सेवकों का संगठन , ज्ञान – विज्ञान की वृद्धि , शिक्षा का विस्तार , मल्ल शालाओं का विकास , दीन – दुखियों के कष्टों का निवारण , स्त्रियों का उत्कर्ष , हरिजनो का उत्थान , समाज की आर्थिक उन्नति , लोकतांत्रिक मर्यादाओं की प्रतिष्ठा, देश – प्रेम पर आश्रित राष्ट्रीय भावना , प्रगतिशील सिद्धांतों का प्रतिपादन , देश कालानुकूल संस्कृति का विकास , नवयुग का निर्माण , आदि सभी क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण योगदान था । उन्होंने देवी संपत्तियों से विभूषित जीवन को समाज सेवा में लगाया एवं समाज सेवा के द्वारा ही अपने जीवन को ऊपर उठाया । वे अपने व्यक्तित्व का विकास किये । मालवीय जी जीवमात्र से कितना स्नेह करते थे उससे समता का अनुभव करते थे । इसका पता इस रोचक घटना से भी लगता है जिसे उन्होंने स्वयं पंडित रामनरेश त्रिपाठी को सुनाई थी……

त्रिपाठी जी लिखते हैं कि मालवीय जी ने उनसे कहा बिछौने पर एक चींटी चढ़ आयी थी उसको पड़कर मैं उसे नीचे उतार देना चाहता था , पर वह हाथ नहीं आ रही थी इधर पकड़ने जाता उधर भाग जाती अपने बचाव के लिए उसका प्रत्येक बार प्रयत्न ही बड़ा ही प्रिय लग रहा था एक चींटी में भी जीवन रक्षा का वैसा ही उद्यम है जैसा प्रत्येक प्राणी में है। सभी में समान जीव हैं जब कोई लापरवाही से चींटी को मार देता है तो उस पर मुझे बहुत कष्ट होता है ।

मालवीय जी शील के बहुत नियमित थे सदा उसका उसे उन्हें विशेष ध्यान रहता था जब भी कभी उनसे उसका उल्लंघन हो जाता तब उन्हें उसका बहुत संताप होता था और वह उस संबंधित व्यक्ति से तुरंत क्षमा प्रार्थना करते थे वह अपने छोटी से छोटी भी गलतियों को याद रखने और पांचवें या छठे वर्ष हरिद्वार जाकर विधिवत सर्वप्रायश्चित करते । इस प्रकार अपने जीवन को निर्मल बनाए रखने का हमेशा प्रयत्न करते रहते थे।

डॉ सुबाष चन्द्र वाराणसी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *