आजकल दिन प्रतिदिन हिंसक घटनाओं के समाचार, दुर्घटनाओं के समाचार अग्रिकांड, मारपीट, हत्या से जुड़े हुए और उग्रता से भरे समाचार पढ़ने को मिल रहे हैं। यह साफ बताता है कि सहनशीलता गायब हो रही है. विचारणीय प्रश्न यह है कि यही लोग आज से वर्ष पूर्व तक भी थे किन्तु ऐसी बेमिसाल घटनाएं नहीं सुनायी पड़ती थी। स्त्रीयां अपने पति की ही हत्या कर रही है या करवा रही है। दूसरी ओर जानवर भी हिंसक हो रहे हैं।

एक समाचार के अनुसार खेत में पति पत्नी काम कर रहे थे। गर्मी की सब्जियों की देखभाल रहे थे कि एक कुत्ता औरत के ऊपर हमला कर देता है पति आवाज सुनकर जब आता है तो उसपर भी कुता हमला कर देता है औरत की तो मृत्यु ही हो जाती है और पति भी गंभीर रूप से घायल हो जाता है। जब तक बगल के खेतों से लोग जुटे तो उनपर भी आक्रमण करने लगता है तब उसे घेर कर गांववालों ने पीट कर मार डाला।

ऐसी घटनाएँ पहले नहीं सुनी जाती थी।इसी प्रकार की अन्य घटनाएँ जो पशुओं से लेकर मनुष्यों तक में देखने को आ रही है। उन पर कही भी कोई विचार नहीं होता दिखता है।

इसी प्रकार मौसम में भी अप्रत्याशित परिवर्तन दिख रहा है।यह लगभग तीसरा वर्ष है जब वर्षा ठीक से नहीं हुई। दूसरी ओर किसान लोग पंप सेटों का सहारा लेकर कृषि तो कर रहे किन्तु खेतों में नमी बरकरार नहीं हो पा रही। जिससे उत्पादन वांछित मात्रा में नहीं हो रहा है।

दूसरी तरफ बिजली का खर्च भी बढ़ा है।जल की मात्रा कम हो रही है।

इन बिन्दुओं पर कही भी कोई चर्चा नहीं दिखती है।सरकारें सिर्फ लडाई झगडे में पड़ी है. उनके पास कोई ऐसा विभाग या मंत्रालय है। ही नहीं जो इन पर तात्कालिक किन्तु दूरगामी प्रभाव की समस्यायों पर त्वरित निर्णय करे और बचाव की कार्यवाही हो। यह माना जा सकता है कि यह कार्य वैज्ञानिकों द्वारा ही संभव है किन्तु सरकारों में कोई भी वैज्ञानिक दिखता नही। वहां तो सिर्फ पॉलिटिक्स वह भी एक दूसरे को नीचा दिखाने का ही प्रयास होता है।यह देश प्रदेश के लिए शुभ नहीं है।देश और देश की जनता से ऊपर कुछभी नहीं हो सकता।

अब हम विचित्र व्यवहार की विवेचना करेंगे।इधर जब से इन्टरनेट और मोबाइल का प्रयोग होने लगा है हाई फ्रिक्वेंसी और उस प्रकार के उपकरणों का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है. हाई फ्रिक्वेंसी के दुष्प्रभावों को भौतिक शास्त्री अच्छी तरह जानते है क्योंकि यह मलिकुलों को तोड़ने में सक्षम होते है। प्राणियों पर उनके टिशु को विघटित करते है जिससे उनका स्वरुप और क्रिया बदल जाती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने बार बार उच्च फैक्सी के दुष्प्रभावों पर चेतावनी दी है किन्तु सरकारों के पास ऐसे लोग है ही नहीं।

भारत सरकार की हालत और उसके सचिवों की हालत तो ट्रक चालकों के मामले में उजागर हो ही चुकी है जिससे सरकार की किरकिरी हुई। विज्ञान में तो और भी ख़राब हालत है. एक भी वैज्ञानिक सोच वाला व्यक्ति वहां नहीं दिखता है।यह हानि कारक है।जनता भुगत रही है और समस्या बढ रही है।

दुसरी ओर पेड़ कट रहे, तो आक्सीजन कहां है । आक्सीजन कहाँ से आएगी? आक्सीजन के आभाव में बंद कमरे या बंद जिम में लोग एकाएक गिर रहे हैं ।तथा कथित हार्ट अटैक मानकर डाक्टर के पास जाते है जो हार्टफेल कह कर छुट्टी कर ले रहे है।पाठकों को ताज्जुब होगा कि यह बीमारी काफी दिनों से है किन्तु इसकी पोस्ट मार्टम नहीं की गयी क्यों? इसका पता कौन करेगा? यह सब सोचने और चिंतित होने का विषय है जो परिदृश्य से गायब है. यह देश हित में नहीं है।जनता को सोचना है।

 

(लेखक के विचार है)

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