वाराणसी। माँ गंगा के पावन तट पर स्थित अघोरेश्वर महाविभूति स्थल के पुनीत प्रांगण में परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी की जननी “माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी” का 32वाँ निर्वाण दिवस बड़ी ही श्रद्धा एवं भक्तिमय वातावरण में मनाया गया। मनाने के क्रम में प्रातः आश्रम परिसर की साफ-सफाई की गई। लगभग 8:30 बजे से पूज्यपाद बाबा गुरुपद संभव राम जी ने परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु एवं माताजी की समाधि पर माल्यार्पण, पूजन एवं आरती किया। इसके बाद श्री देशरत्न पाण्डेय जी ने सफलयोनि का पाठ किया। तत्पश्चात् पूज्य बाबा जी ने हवन-पूजन किया। मध्याह्न 11:15 बजे से एक पारिवारिक विचार गोष्ठी आयोजित की गयी जिसमें वक्ताओं ने माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी को याद करते हुए उनसे प्रेरणा लेने की बात कही। वक्ताओं में श्रीमती डॉ० कमला मिश्र जी, श्रीमती ममता सिंह जी, श्रीमती गिरिजा तिवारी जिएवाम श्रीमती दामिनी जी थीं। कुमारी अपर्णा एवं कुमारी अल्का ने बेटियों को भ्रूण हत्या से बचाने की मार्मिक भावना से ओतप्रोत भजन प्रस्तुत किया। आश्रम प्रांगण में संचालित अवधूत भगवान राम नर्सरी विद्यालय के छात्र वीर सैनी ने भजन प्रस्तुत किया। इसी विद्यालय की छात्रा शुभदा पाण्डेय ने मंगलाचरण किया। गोष्ठी का सञ्चालन उक्त विद्यालय की अध्यापिका श्रीमती अनीता जी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्था के मंत्री डॉ० एस. पी. सिंह जी ने किया।

महापुरुषों की प्रेरणाओं का अनुशीलन आवश्यक

-पूज्यपाद बाबा गुरुपद संभव राम जी

अपने आशीर्वचन में संस्था के अध्यक्ष पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने कहा कि आज माँ महा मैत्रायणी जी के निर्वाण दिवस पर हमलोग एकत्रित हुए हैं। हम अपने अनुभवों को एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं। भजन, प्रवचन या जो बातें कही जाती हैं उनका महत्व तभी है जब उसको हम अपने आचरण में उतारें। अपने अनुभव से ही हम आगे बढ़ते हैं। आज की परिस्थितियों में महापुरुषों की वाणियों का अनुपालन, अनुशीलन करना आवश्यक है तभी हम इन भयावह परिस्थितियों से अपने-आप को बचा सकेंगे। यह संसार है और इसमें शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक अनेक प्रकार के दुखों का हमें सामना करना पड़ता है। हम अपने अत्यदिक मोह के चलते उसमें उलझे हुए हैं। यद्यपि हम सभी जानते हैं कि हमारी आत्मा अजर-अमर है, फिर भी इतना बोझा हम अपने सिर पर लादे हुए हैं। इन सभी शिक्षाओं को जब तक हम अपने में उतरेंगे नहीं तब तक हम हर ऊँची चढ़ाई पर लुढ़कते रहेंगे। हर छोटी-छोटी बात में हमारी स्थिरता चली जाती है। थोड़े सी परेशानी में परेशान हो जाते हैं, जरा सा लालच में मचल जाते हैं। बगैर स्थिरता और एकाग्रता के हम उस ईश्वरीय तत्व को प्राप्त नहीं कर सकते। यहाँ आने का हमारा मकसद इन्हीं सब कारणों से पूर्ण नहीं हो पाता। कितना हमने ग्रहण किया है वह हमारे आचरण-व्यवहार से पता चल जाता है। इस संसार में सबकुछ करते हुए भी हम अपने आत्मोद्धार के प्रति बराबर जागरूक रहें। यही प्रेरणा हमें महापुरुषों से, माताजी से मिलती है। अपने कर्मों का फल तो हमें भोगना ही पड़ता है।

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