दारू पीके घर में आवइं,

बोधई खूब करइं हंगामा।

 

सीवर के गड्ढा से भइले,

सड़क मौत के खाई।

ग्राम प्रधान के देलेन गारी,

छोड़इं न बहिनी -माई।

अबकी चुनाव में जनता फाड़ी,

ओनकर कुर्ता और पैजामा ।

दारू पीके घर में आवइं,

बोधई खूब करइं हंगामा।

 

मुर्गा- मछली बिना न पीअइं,

केतनउं घर में ठाला ।

तीन माह से फीस बिना ,

मुनिया स्कूल न जाला।

कहइं की दारू कृष्ण मुरारी,

हम ओनका के मित्र सुदामा

दारू पीके घर में आवइं,

बोधई खूब करइं हंगामा।

 

एक दिन सामने बीबी के,

घड़ियाली आंसु बहावइं।

अंतिम बार द कर्ज हमइं ,

रोइ- रोइ के हाल सुनावइं।

अंगूठा टीपि नशे में खेत,

सेठ के कइ दिहली बैनामा।

दारू पीके घर में आवइं,

बोधई खूब करइं हंगामा।

 

दारू पिअक्कड़ी अइसन,कि,

घर, खेत- दुआर बिकाइल।

शिक्षा बिना विवेक -बुद्धि

के, बाग गई मुरझाइल।

आपन बिगड़े साथ न देइहैं,

साला- साली, मामी- मामा।

दारू पीके घर में आवइं,

बोधई खूब करइं हंगामा।

 

कवि राम नरेश “नरेश”

वरिष्ठ साहित्यकार

वाराणसी(उत्तर प्रदेश)

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