(बसंत पंचमी पर- सरस्वती वंदना)

 

 

वीणा वादिनी, हंस वाहिनी,

वाणी में मधुरस भर दो।

अहंकार अभिमान हरो मां,

तिमिर विहीन धरा कर दो। ।

पंक्ति पंक्ति बन जाए वंदन,

शब्द – शब्द से हो अभिनंदन।

सांसों में हो गीत- गज़ल,

नव छंद अमर कर दो।

अहंकार अभिमान हरो मां,

तिमिर विहीन धरा कर दो।।

 

स्वर – संयोजन हों अभिकल्पित,

अलंकार श्रृंगार हों अर्पित।

मधुर कल्पना अंबर चूमे,

अनुसंधान प्रखर कर दो।

अहंकार अभिमान हरो मां,

तिमिर विहीन धरा कर दो।।

 

निर्झर झरना सा मन निर्मल,

सदा रहे उर अंतर विह्वल।

समरसता, समभाव – सहजता,

निजता और मुखर कर दो।

अहंकार अभिमान हरो मां,

तिमिर विहीन धरा कर दो।।

 

बुद्धि,विवेक बढे नित चिंतन,

परहित से सुरभित हो जीवन।

राष्ट्र भक्ति जागे सब में,

श्रद्धा – सद्भाव मधुर कर दो।

अहंकार अभिमान हरो मां,

तिमिर विहीन धरा कर दो।।

 

गीता,कुरान,मंदिर – मस्जिद

अब,साथ मनायें होली- ईद।

धर्म – जाति का भेद मिटाकर,

मानवता ऊपर कर दो।

अहंकार अभिमान हरो मां,

तिमिर विहीन धरा कर दो।।

 

कवि राम नरेश “नरेश”

वरिष्ठ साहित्यकार

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

 

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