
सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में चतुर्दिवसीय काशी शब्दोत्सव 2024 का उद्घाटन
वाराणसी आज चतुर्दिवसीय काशी शब्दोत्सव 2024 का प्रारम्भ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक मुख्य भवन सभागार में हुआ। कार्यक्रम का विषय ‘विकसित भारत; विश्वगुरू भारत’ है। कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. महेन्द्र नाथ पाण्डेय, केन्द्रीय मन्त्री भारी उद्योग, भारत सरकार तथा विशिष्ट अतिथि श्री काशीविश्वनाथ मन्दिर न्यास के अध्यक्ष प्रो. नागेन्द्र पाण्डेय जी थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ने की।
कार्यक्रम का प्रारम्भ वैदिक और पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। मंगलाचरण के उपरान्त अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरूआत की।
मुख्य अतिथि केन्द्रीय मंत्री, भारत सरकार डॉ. महेन्द्र नाथ पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत सदा से ज्ञान और विज्ञान का केन्द्र रहा है। उसमें भी काशी अद्भुत है, जो ज्ञान व आध्यात्मिक चेतना का केन्द्र है। काशी से निकला ज्ञान विश्व का आदर्श बनता है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सौ वर्षों के गुलामी ने हमें एक प्रकार की आत्महीनता से युक्त कर दिया था। देश की स्वतंत्रता के बाद भी हमारी यह गुलामी की मानसिकता बनी रही, परन्तु वर्तमान में भारत ने विज्ञान, संस्कृति और अन्र्तराष्ट्रीय राजनीति में आशातीत सफलता प्राप्त की है। कोविड काल में भारत ने न केवल अपने १४० करोड़ जनता की वैक्सीन देकर पाया बल्कि विश्व के १२० देशों को वैक्सीन देकर वसुधैव कुटुम्बकम की संकल्पना को साकार किया। रूस-यूक्रेन युद्ध में भारतीय छात्रों की जिस प्रकार रक्षा की गयी, वह सराहनीय है। आज आबू-धाबी जैसे इस्लामिक देश में भी मन्दिर का बनना भारत की शक्ति व सामथ्र्य का प्रतीक हैं। प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने 2047 तक जो विकसित भारत का संकल्प लिया है वह अवश्य पूरा होगा तथा भारत एक बार पुन: विश्वगुरू के सम्मान पर प्रतिष्ठित होगा। 
विशिष्ठ अतिथि श्री काशीविश्वनाथ न्यास के अध्यक्ष प्रो. नागेन्द्र पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में वह नैतिक मूल्य है जो विश्व का मार्ग दर्शन कर सकते हैं। आज भारत अपने पुराने गौरव की ओर तेजी से बढ़ रहा है। विदेशी आक्रान्ताओं के दौर में हमारी अस्मिता व मूल्य पर प्रहार किया गया। जिसके कारण हमारी राजसत्ता व समाज औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त थे, परन्तु पुन: भारत लोक मंगल की कामना करने वाले विश्वगुरू के स्थान को प्राप्त करेगा।
अध्यक्षता कर रहे प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ने कहा कि काशी सामान्य धरती नहीं है। यह ज्ञान, विज्ञान व कला का श्रोत है। विश्व का सारा ज्ञान संस्कृत भाषा में निहित है। उस संस्कृत भाषा में निहित ज्ञान के संरक्षण व संवर्धन का कार्य सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय कर रहा है। यहाँ से जो ज्ञान धारा निकलेगी वह सम्पूर्ण विश्व हेतु कल्याणकारी होगी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 22 जनवरी को प्रभु श्रीराम के मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा, भारतीय राष्ट्र की प्राण प्रतिष्ठा है। उन्होंने यह आशा व्यक्त की कि इस शब्दोत्सव के विभिन्न सत्रों में जो ज्ञान मंथन होगा। उससे सम्पूर्ण विश्व में एक संदेश जाएगा। कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत प्रो. जितेन्द्र कुमार, पूर्व संकायाध्यक्ष, आधुनिक ज्ञान विज्ञान तथा संचालन डॉ. रविशंकर पाण्डेय द्वारा किया गया।
काशी शब्दोत्सव के संयोजक डॉ. हरेन्द्र राय ने इस कार्यक्रम के उद्देश्य व महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रो. शैलेश कुमार मिश्र तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. राजनाथ, विभागाध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान विभाग ने किया।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से श्री मनोज कांत, क्षेत्र सह-प्रचार प्रमुख पूर्वी उ.प्र. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, श्री जय प्रकाश क्षेत्र-व्यवस्था प्रमुख पूर्वी उ.प्र. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, डॉ. राकेश तिवारी सह-प्रान्त कार्यवाह काशी प्रान्त, डॉ. दिनेश पाठक सह-प्रान्त प्रचार प्रमुख काशी प्रान्त, प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, पूर्व कुलपति, अन्र्तराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, प्रो. राम पूजन पाण्डेय, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी समेत अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
उद्घाटन सत्र के बाद भारतीय ज्ञान दृष्टि विषयक तकनीकी सत्र का आयोजन हुआ। इस सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल तथा विशिष्ट वक्ता प्रो. राम पूजन पाण्डेय रहे।
मुख्य वक्ता प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने अपने वक्तव्य में कहा कि ज्ञान की भारतीय व पाश्चात्य दृष्टि एक दूसरी से नितान्त भिन्न है। भारतीय ज्ञान दृष्टि भौतिक उन्नति से अलग व्यक्ति के नैतिक उत्थान को महत्व देती है। ज्ञान वही है, जो व्यक्ति को शुभ की ओर प्रेरित करे और अशुभ से दूर ले जाए। विशिष्ट वक्ता प्रो. रामपूजन पाण्डेय ने कहा कि प्राचीन भारत में तक्षशिला, नालन्दा व विक्रमशिला जैसे ज्ञान के केन्द्र थे, जो भारत को नेतृत्व देने का कार्य करते थे। पश्चिम का सारा विज्ञान भौतिकता पर केन्द्रित है जबकि भारत का दर्शन शांति की ओर ले जाता है। सत्र की अध्यक्षता प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी तथा संचालन प्रो. रमेश प्रसाद ने की।
