
(डा प्रेम शंकर दुबे, अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक)
वाराणसी।मन में एक प्रश्न उठा है कि क्या कोई देश आज के युग में विज्ञान के बिना भी आगे बढ़ सकता है? यह प्रश्न माननीय प्रधान मंत्री जी के एक चित्र जो समाचार पत्रों में स्कूबा गोताखोर विधि से द्वारका के समुद्र में ध्यान में मुद्रा में दिखे है. प्रश्न यह है कि विज्ञान की उपलब्धियां तो बड़ी अच्छी लगती है किन्तु इन्हें आगे बढ़ाये जाने की भी जरुरत है क्या?? संभवतः सरकार की दृष्टि में उतना नहीं जितना लोग समझते है. भारत तो सब कुछ चुनाव और राजनीती से कर लेगा ऐसी धारणा दिखने लगी है जो आज नहीं तो कल घातक ही होगी।
वर्ष 2024 के गणतंत्र दिवस पर भारत के विशिष्ट व्यक्तियों को उनकी उपलब्धियों के आधार पर पद्मपुरस्कार प्रदान किया जाता है. ताज्जुब का विषय रहा कि किसी भी वैज्ञानिक का उसमे कही अता पता नहीं था!! एक बात और भी साफ़ थी कि अन्य वैज्ञानिक जो सरकार से दूर है किन्तु उपयोगी शोध और उपलब्धियां प्राप्त कर रहें हैं उनपर ध्यान न गया किन्तु जिन स्पेस सेंटर के वैज्ञानिक जिन्हें माननीय प्रधानजी खुद कहते रहे है कि चन्द्रमा के ऐसे स्थान पर जहाँ विश्व के किसी देश का झंडा नहीं पंहुचा वहां पर भारतीय झंडा लगा. तो क्या वह भी मान लिए गए?? सम्भवतः यह देश के स्वस्थ चिंतन की झलक नहीं
अब बात आज दिनांक 28 फ़रवरी की जिसे विज्ञान दिवस कहा जाता है और काफी चर्चा इस लिए होती है कि इसी दिन सर सीवी रमन को प्रकाश के एक विशेष प्रभाव को देखा गया था और सबसे बड़ी बात यह थी कि यह एक अत्यंत छोटे उपकरण से हुई ,भारतीय मनीषियों ने इसीलिए कहा भी है ” क्रिया सिद्धिः सत्त्ये भवति, महताम नोपकरने”, अर्थात चिंतन में ही ज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धि प्राप्त हो सकती है, सिर्फ पैसे या मशीनों ने नहीं. यह उक्ति प्रोफेसर रमण ने अपने शोध से साबित किया और विश्व की सर्वोच्च शोध पेश किया।
इस अवसर पर सरकार को अच्छे व्याख्यान, गंभीर हो तो रमण प्रभाव को लैब में भी दिखा पर युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन दिया जाना समीचीन होगा।
संक्षेप में यह पर्याप्त होगा कि आज औषधियों के क्षेत्र में, रसायनों के क्षेत्र में और नए सिंथेटिक पदार्थों के निर्माण में उनकी गुणवत्ता निर्धारण आदि करने में बहुत बड़ा योगदान हो रहा है. सरकार की विज्ञानं की उपेक्षा देश के लिए हित कर नहीं मानी जानी चाहिए सोचने की जरुरत है की उर्जा, रसायन, दवाइयां, रसायन, बीज, खाद, नयी धातुएं और अलॉयज खनिज प्रसंकरण, आदि सभी क्षेत्रों में गहन रूप से विज्ञान की आवश्यकता है और आगे भी होगी. यह भाषा शास्त्र, इतिहास, पोलिटिकल साइंस, समाज शास्त्र, मिईलित्रि साइंस, दर्शन शास्त्र जैसे विषयों से नहीं संभव होगी. देश को अब सोचना पड़ेगा नहीं तो दिन दिन बेरोजगारी वृद्धि होगी और रोजगार न होने पर आत्महत्या और अन्य सामाजिक समस्याओं की वृद्धि होगी.।
(लेखक का अपना विचार है)
