यूपी कालेज में हरिशंकर परसाई का लेखन : समय, समाज और संस्कृति का प्रतिबिम्ब ‘ विषयक संगोष्ठी

वाराणसी। हरिशंकर परसाई की कहानियों में रेखाचित्र, संस्मरण और रिपोर्ताज की रंगीन छटा विद्यमान है। यह बातें बुधवार को यूपी कालेज में हिन्दी विभाग और प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से सुप्रसिद्ध लेखक हरिशंकर परसाई के जन्मशताब्दी वर्ष में हरिशंकर परसाई का लेखन : समय, समाज और संस्कृति कि प्रतिबिम्ब ‘ विषयक संगोष्ठी में साहित्यकार डा.रामसुधार सिंह ने कहीं। उन्होंने कहा कि उनकी कहानियां कहानी के पारंपरिक ढांचे को तोड़ती हैं। कहानी की रुचि,संस्कार और संस्कृति को बदला है। अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध कथाकार और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो. विभूति नारायण राय ने हरिशंकर परसाई के साहित्य को ‘सामाजिक विसंगतियों से संघर्ष’ का साहित्य माना और परसाई को लोकतंत्र का लेखक कहकर संबोधित किया। विशिष्ट अतिथि प्रो. अवधेश प्रधान ने परसाई के लेखन वैशिष्ट्य पर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि हरिशंकर परसाई के लेखन में एक विशेष वाक्चातुर्य है जिसे उन्होंने अपनी पूर्व परंपरा से ग्रहण किया। वरिष्ठ आलोचक एवं ‘वागर्थ’ पत्रिका के संपादक डॉ. शंभुनाथ ने परसाई के व्यंग्य की भाषाई सहजता के पक्ष को रखते हुए कहा कि परसाई का व्यंग्य सभी को सम्मिलित कर के चलने का पक्षधर है। परसाई के लेखन में समसामयिकता, लोकप्रियता एवं साहित्यिकता तीनों साथ-साथ चलते हैं। स्वागत यूपी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने किया। संचालन संयोजक प्रो. गोरख नाथ और प्रो अनीता सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सपना सिंह ने किया। प्रथम सत्र ‘भारतीय लोकतंत्र और हरिशंकर परसाई’ विषय पर केंद्रित रहा। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कहानीकार राजेन्द्र चंद्रकांत राय ने हरिशंकर परसाई और किशोर कुमार के संस्मरणों को साझा किया। इसके माध्यम से इन्होंने परसाई के भारतीय समाज और लोकतंत्र से जुड़े स्वप्नों पर वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मनुष्यता का निर्माण ही परसाई के साहित्य का लक्ष्य रहा। मुख्य वक्ता प्रो. आशीष त्रिपाठी ने परसाई के साहित्य की विवेचना करते हुए बताया कि उनके लिए जनतंत्र सिर्फ कन्टेंट की वस्तु नहीं। वे अपने साहित्य में जनतंत्र को स्थापित करने के पक्षधर हैं। प्रो. नीरज खरे ने प्रेमचंद को परसाई का पुरखा बताते हुए कहा कि परसाई के निबंध लोकतंत्र की समस्त समस्याओं एवं विसंगतियों को उभारते हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जन के छिनते अधिकारों पर तीखा व्यंग्य किया है। प्रो. आनन्द शुक्ल ने परसाई को बेबाक और निडर साहित्यकार मानते हुए बताया कि राजनीति के साथ धर्म के जुड़ाव एवं अंधश्रद्धा के संकट के विरुद्ध परसाई ने अपना स्वर बुलंद किया। इस सत्र का संचालन डॉ. वंदना चौबे और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मधु सिंह ने किया। दूसरा सत्र ‘ हिंदी गद्य लेखन की परंपरा और हरिशंकर परसाई ‘ था जिसकी अध्यक्षता डॉ. गया सिंह ने किया। कहा कि परसाई को केवल व्यंग्य तक सीमित रखकर देखना उनका सही पाठ नहीं है। यह सही है कि उन्होंने व्यंग्य को एक स्वतंत्र विधा बना दिया लेकिन उनका गद्य का कैनवास काफी बड़ा है।‌ सत्र के मुख्य अतिथि के दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो अनिल राय ने कहा कि हरिशंकर परसाई का लेखन संसार, विषय और परिप्रेक्ष्य की दृष्टि से ही नहीं शिल्प की दृष्टि से भी विविधतापूर्ण है। उन्हें केवल व्यंग्यकार के रूप में देखना उन्हें सीमित करना है। मुख्य वक्ता प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि हरिशंकर परसाई का गद्य हिंदी नवजागरण के भीतर से विकसित हुआ, नवजागरण का विस्तार पराधीन भारत से स्वाधीन भारत में जिस प्रकार हुआ उसकी प्रतिध्वनि हरिशंकर परसाई के गद्य में देखने को मिलती है। हिंदी गद्य की जो परम्परा भारतेंदु बाबू से शुरू होकर बालमुकुंद गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी से होते हुए हरिशंकर परसाई तक आती है, उसमें हरिशंकर परसाई स्वीकार करते हैं कि वे बालमुकुंद गुप्त से सर्वाधिक प्रभावित हैं। डॉ. राम सुधार ने कहा कि परसाई जी का क्षेत्र बेहद बड़ा है, जहाँ कहीं उन्हें विद्रूपता, भ्रष्टाचार दिखाई दिया है उसको अपने लेखन में परसाई ने दर्ज किया है। भाषा के स्तर पर भी परसाई ने खूब सहजता का समावेश अपने गद्य में किया है।

प्रो. प्रभाकर सिंह ने कहा हरिशंकर परसाई ने जो गद्य लिखा है वह संवाद शैली में लिखा गया है, लेकिन बोलचाल की शैली में लिखे गद्य में जो रचनात्मक आकर्षण परसाई पैदा करते हैं वह बहुत विशेष है। परसाई ने केवल व्यंग्य ही नहीं लिखा बल्कि उनका गद्य नैसर्गिक है और उस पर व्यंग्यकार शरद जोशी ने भी लिखा है। संचालन डॉ. विंध्याचल यादव ने किया, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनिल सिंह ने किया। संगोष्ठी में डा.(मेजर) अरविन्द कुमार सिंह,प्रो. शाहीना रिजवी, डा एम पी सिंह, शिवकुमार परा, प्रो.सुधीर राय , प्रो. सुधीर शाही, प्रो. शशिकांत द्विवेदी, प्रो. एस. के. सिंह, रत्न शंकर पाण्डेय आदि थे।

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