वाराणसी। डा.बामदेव पांडेय ने कहा कि आज किसी की प्रगति का मानक उसकी भौतिक सम्पन्नता अथवा कथित सामाजिक प्रसिद्धि हो गई है। भले ही इसे प्राप्त करने में मानवता का हनन ही क्यों न हुआ हो। इसीलिए लोग आज दूसरों के हक-अधिकारों का भी दोहन कर अकूत संपत्ति इकठ्ठा करने में संलिप्त हैं। ऋषि-मुनियों तथा साधू-संतों के इस देश में आयातित संस्कृति हमें हमारे संस्कारों से दूर कर दी है। डा.पांडेय ने कहा कि गत दशकों में राष्ट्रीयता में गिरावट से हम समाज सेवा तो दूर घर-परिवार और यहाँ तक कि स्वयं के साथ भी अनुचित व्यवहार कर रहे हैं। अशांति और अस्थिरता के इस जटिल दौर में एक सुदृढ़ वैचारिक क्रांति ही व्यापक स्तर पर मानवता की रक्षा कर सकती है। परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम के प्रत्येक शब्द मानवता की रक्षा के लिए हैं। उनकी वाणियाँ धर्मग्रंथों से कहीं बहुत अधिक बोधगम्य और अनुकरणीय हैं। राष्ट्रीय युवाशक्ति की वर्तमान स्थिति पर दृष्टिपात करते हुए उन्होंने कहा है कि …सही दिशा-निर्देशन के अभाव में, राष्ट्र के निर्माण में ये तरुण, युवक नियोजित नहीं हो पा रहे हैं। इनके बीच रहकर इन्हें आदर्श आचरण की प्रेरणा देने की नितांत आवश्यकता है। सच पूछो तो संत, महात्मा, अवधूत, औघड़, अघोरेश्वर लोग ही आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते हैं। स्वयं आदर्श जीवन जीकर तुम दूसरों को तदैव जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते हो। हमारे देश के नेतागण और ग्रामों-नगरों के मुखिया तो अपने-आप में स्वयं ही उलझे हुए हैं और दूसरों को उलझाते रहते हैं। उनसे कुछ आशा करना पागलपन के सिवा और कुछ नहीं होगा। हमारे तरुणों, युवकों की तुलना दुधारू गायों से की जानी चाहिए। गायों को धो-पोंछ कर स्वच्छ साफ खाना और जल खिला-पिला कर हृष्ट-पुष्ट बनाये रखा जाता है। फलस्वरूप उनसे सुमधुर अमृतमय दूध का दोहन किया जाता है, जो मानव के लिए बहुत ही कल्याणकारी होता है। उसी प्रकार से ये नवयुवक दुधारू गायों की तरह हैं। उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और संतुलित बनाये रखकर राष्ट्र के लिए अमृतमय दूध सरीखी महान उपलब्धियों की आशा की जा सकती है। इनके मूकवत् होने के कारण इन्हें गलत लोग गलत मार्ग पर ले जाते हैं और राष्ट्र-द्रोह जैसा कुत्सित कार्य भी कराते हैं। ये लोग इन तरुणों, नवयुवकों के मन में राष्ट्रीयता, राष्ट्र के प्रति संवेदनशीलता और सम्यक् एवं संतुलित दृष्टिकोण तथा आचरण की प्रेरणा नहीं दे पाते हैं। जो गिरे हुए व्यक्ति हैं, उनमें दूसरे गिरे हुए व्यक्तियों को गिरने से रोकने का सामर्थ्य नहीं होता है। जो उठे हुए होते हैं, सज्जन होते हैं, महापुरुष होते हैं, वे ही उन्हें उठाने और गिरने से रोकने में सहायता करते हैं, जो गिर गए हैं, गिर रहे हैं। ऐसा सामर्थ्य उन्हीं में होता है। अतः हमारे राष्ट्र-नायक, मुखिया जो स्वयं गिरे हुए हैं वे क्या गिरे हुए को उठायेंगे या गिरते हुए को सँभालेंगे। …संत, महात्मा, सज्जन ही गिरे को उठाते हैं और जो गिरते जा रहे हैं उन्हें गिरने से बचाते हैं। अपने राष्ट्र, समाज, ग्राम और नगर के लिए यह अत्यंत ही अनिवार्य है कि हम अपने तरुणों-युवकों का पथ-प्रदर्शन करें। उनमें उत्तम विचारों, उत्तम भावनाओं और त्यागमय जीवन जीने की प्रेरणा दें। उन्हें सदाचरण की प्रेरणा दें। प्रश्न है, किनको? उन तरुण युवकों को जो निष्कलंक, निर्विघ्न, निर्विकार, निर्द्वंद हैं और जिनका हृदय-पटल जल के समान स्वच्छ और निर्मल है। इस पर तुम चाहो तो कूड़ा पटक दो या उसे स्वच्छ और साफ कर निर्मल आईना की तरह चमका दो ताकि उस आईना में जो भी अपना मुख देखे वह आदर्श आचरण का ही मुख देखे। इन तरुणों, नवयुवकों ने यदि आदर्श अपनाया तो राष्ट्र से कलह बहुत दूर भाग जायेगा चोर-चुहाड़-जुआरी बहुत दूर भाग जायेंगे। आज हमें चिंतन करना होगा, आत्ममंथन करना होगा कि कैसे हम वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था की दुर्बलताओं के बीच जीते हुए अपने भारतीय संस्कारों की रक्षा करें। भाद्र शुक्ल सप्तमी को अघोरेश्वर जयंती के पवन अवसर पर हम अघोरेश्वर महाप्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हमें सद्बुद्धि हो जिससे हम राष्ट्र-ऋण के प्रति सदा कर्तव्यनिष्ठ रहें।

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