
वाराणसी।यज्ञ वेदों में प्रतिपादित एक विशिष्ट वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है। यज्ञ के माध्यम से आध्यात्मिक संपदा की भी प्राप्ति होती है।
श्रीमद्भागवत् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने यज्ञ करने वालों को परमगति की प्राप्ति की बात की है। यज्ञ एक अत्यंत ही प्राचीन पद्धति है, जिसे देश के सिद्ध-साधक संतों, विद्वानों और ऋषि-मुनियों ने समय-समय पर लोक कल्याण के लिए करवाया। यज्ञ में मुख्यत: अग्निदेव की पूजा की जाती है। भगवान अग्नि प्रमुख देव हैं। हमारे द्वारा दी जाने वाली आहुति को अग्निदेव अन्य देवताओं को प्राप्त कराते हैं, फिर वे ही देव प्रसन्न होकर उन हवियों के बदले कई गुना सुख, समृद्धि और अन्न-धन देते हैं।
उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वेद विभाग के यज्ञशाला में कार्तिक मास के उपलक्ष्य में अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगदगुरु स्वामी देवादित्यानन्द सरस्वती जी महाराज ने ऑनलाईन माध्यम व्यक्त किया।
उनकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद से दण्डी स्वामी गौ लोकधाम, लुधियाना की ओर से नव दिवसीय श्री विष्णु महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है।
जिसमें श्री विष्णु महायज्ञ के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ऑनलाइन माध्यम से अपने आशीर्वचन में बताया कि यज्ञ मानव जीवन को सफल बनाने के लिए एक आधारशिला है। इसके कुछ भाग विशुद्ध आध्यात्मिक हैं। अग्नि पवित्र है और जहां यज्ञ होता है, वहां संपूर्ण वातावरण, पवित्र और देवमय बन जाता है। यज्ञवेदी में ‘स्वाहा’ कहकर देवताओं को भोजन परोसने से मनुष्य को दुःख-दारिद्र्य और कष्टों से छुटकारा मिलता है। वेदों में अग्नि परमेश्वर के रूप में वंदनीय है। अग्निदेव से प्रार्थना की गई है कि हे अग्निदेव! तुम हमें अच्छे मार्ग पर ले चलो, हमेशा हमारी रक्षा करो।
इस महायज्ञ के प्रेरणास्रोत कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि यज्ञ को शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा गया है। इसकी सुगंध समाज को सुसंगठित कर एक सुव्यवस्था देती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यज्ञ करने वाले अपने आप में दिव्यात्मा होते हैं। यज्ञों के माध्यम से अनेक ऋद्धियां-सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। यज्ञ मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाला होता है। विशेष आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विशेष संकट निवारण के लिए और विशेष शक्तियां अर्जित करने के लिए विशिष्ट विधि- विधान भी भिन्न-भिन्न हैं। यज्ञ भगवान विष्णु का ही अपना स्वरूप है। इसे भुवन का नाभिकेंद्र कहा गया है। याज्ञिकों के लिए आहार-विहार और गुणकर्म को ढालने के लिए विशेष प्रावधान बताया गया है। यज्ञ से ब्रह्म की प्राप्ति होती है। यह इंसान की पाप से रक्षा करता है, प्रभु के सामीप्य की अनुभूति कराता है।
यज्ञ के माध्यम से मनुष्य में दूसरे की पीड़ा को समझने की समझ आ जाती है, अच्छे-बुरे का फर्क महसूस होने लग जाता है तो समझ लेना चाहिए कि यज्ञ सफल है। जो कि आज यज्ञ के प्रभाव से देखने को मिल रहा है। यज्ञ करने वाले आपसी प्रेम और भाईचारे की सुवास हर दिशा में फैला रहे हैं। सर्वत्र शान्ति की स्थापना हो रही है।
वर्तमान में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वेद विभागीय यज्ञशाला में माननीय कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा जी की सत्प्रेरणा एवं प्रयास से वेद विभाग के आचार्य डॉ. विजय कुमार शर्मा के आचार्यत्व।एवं संयोजकत्व में संवत्सरव्यापी चतुर्वेद स्वाहाकार विश्वकल्याण महायज्ञ का सञ्चालन किया जा रहा है जिसे निरन्तर दो सौ बयालीस दिन पूर्ण हो चुके हैं।
इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. महेन्द्र पाण्डेय ने महाराज जी को धन्यवाद ज्ञापित कर आशीर्वाद लिया। कार्यक्रम में उद्योगपति श्री राजेश कुमार भाटिया, प्रदीप अग्रवाल, जयशंकर शर्मा, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. ब्रजभूषण ओझा, विश्वविद्यालय के प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. हरिशंकर पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा, डॉ. दुर्गेश पाठक, डॉ. मधुसूदन ओझा, श्री जिज्ञासु पाण्डेय, श्री अनिकेत मिश्र आदि सहित अनेक छात्र उपस्थित रहे।
