कवि ई रामनरेश नरेश

 

बढ़ गई ठंड ज्यादे बहे सीत लहरी ,

रजाई पुरानी क्या गंवई क्या शहरी I

बूढ़े,बच्चे- जवां सब जलावें अंलाव,

नया साल आया चलें अपने गाँव II1II

 

कंबल – चादर पुराने सभी साथ लें,

दें पड़ोसी को राहत की वे सांस लें I

अपनी माटी बढ़ायेगी सबसे लगाव,

नया साल आया चलें अपने गाँव II2II

 

घर में सूना लगेगा नहीं श्री मतीजी,

होंगे भाभी- भइया,भतीजा- भतीजीI

टपकेगा आँसू बनके सनेहिया के भाव,

नया साल आया चलें अपने गाँव II3II

 

बुलबुल – गौरैया की मीठी- मीठी सुबोली,

मैना,तोता – पपीहा की नटखट ठिठोली I

कौआ आंगन में ऊपर करे काँव – काँव,

नया साल आया चलें अपने गाँव II4II

 

ले जायें गुड़,चिउड़ा, तिल- दाल पट्टी,

ढूँढ़ी, लडडू,बतासा,रेउड़ी,लाई – गट्टी I

पाएंगे सुंदर आशीष तब अपने ठाँव,

नया साल आया चलें अपने गाँव II5II

 

संस्कारों की बगिया सुमन बन के महके,

प्यार – स्नेह हर कोने- कोने में चमकें I

जीवन में सुख- दुःख है,बहती नदिया का नांव,

नया साल आया चलें अपने गाँव II6II

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