वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, नई दिल्ली द्वारा संचालित पाण्डुलिपि संरक्षण एवं डिजिटलीकरण परियोजना की एक वर्ष की सफल पूर्णता के उपलक्ष्य में एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया। अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा की।

जिसमें विश्वविद्यालय के कुलसचिव, राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के निदेशक, तथा पुस्तकालयाध्यक्ष प्रो. राजनाथ विशेष रूप से उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में पिछले एक वर्ष के दौरान किए गए पाण्डुलिपि संरक्षण कार्यों की उपलब्धियाँ, उनकी वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक महत्ता, तथा भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की गई।

विदित हो कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में हजारों दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित हैं, जिनमें अनेक प्राचीन वैदिक ग्रंथ, उपनिषद, तंत्र-शास्त्र, ज्योतिष, आयुर्वेद, दर्शन एवं व्याकरण से संबंधित अनमोल सामग्री संग्रहीत है। इनका संरक्षण राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन द्वारा नवीनतम तकनीकों के माध्यम से किया जा रहा है, जिससे यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा –“सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ दुर्लभ एवं प्राचीन पाण्डुलिपियाँ संकलित हैं। इनका संरक्षण केवल विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का एक महत्वपूर्ण अभियान है। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के सहयोग से विश्वविद्यालय इस दिशा में ऐतिहासिक कार्य कर रहा है, जिससे भारत के शास्त्रीय ज्ञान का पुनरुद्धार होगा।”

उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटलीकरण के माध्यम से इन दुर्लभ ग्रंथों को शोधार्थियों, छात्रों एवं संस्कृत प्रेमियों के लिए सहज उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर नए शोध को बढ़ावा मिलेगा।

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, नई दिल्ली के निदेशक ने कहा कि –

“भारत की प्राचीन पाण्डुलिपियाँ केवल कागज़ पर लिखे हुए ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सभ्यता, संस्कृति और शास्त्रों की अनमोल धरोहर हैं। इस मिशन का उद्देश्य इन पाण्डुलिपियों को नवीनतम तकनीकों द्वारा संरक्षित करना, उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करना और उन्हें वैश्विक शोध समुदाय के लिए सुलभ बनाना है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय इस कार्य में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है।”

उन्होंने यह भी बताया कि इस परियोजना के तहत अब तक हजारों पाण्डुलिपियों को डिजिटलीकृत किया जा चुका है और आगामी वर्ष में इस कार्य को और व्यापक रूप से आगे बढ़ाया जाएगा।

पुस्तकालयाध्यक्ष प्रो. राजनाथ जी ने कहा कि –“सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का पुस्तकालय भारत के सबसे समृद्ध ग्रंथागारों में से एक है, जहाँ प्राचीन एवं दुर्लभ ग्रंथों का अपार भंडार है। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के अंतर्गत अब तक हजारों पाण्डुलिपियों का संरक्षण, डिजिटलीकरण एवं पुनर्संरक्षण किया जा चुका है। इससे शोधार्थियों को उनकी अध्ययन सामग्री आसानी से उपलब्ध होगी और दुर्लभ ग्रंथों की रक्षा सुनिश्चित होगी।”संरक्षित पाण्डुलिपियों की विशेष प्रदर्शनी – कार्यक्रम में अब तक संरक्षित प्रमुख पाण्डुलिपियों का विशेष प्रदर्शन किया गया, जिसमें वेद, पुराण, ज्योतिष, आयुर्वेद एवं तंत्र से संबंधित ग्रंथ शामिल थे। विशेष व्याख्यान सत्र – विद्वानों एवं शोधकर्ताओं ने पाण्डुलिपि अध्ययन की महत्ता, संरक्षण की आधुनिक तकनीकें, डिजिटलीकरण की प्रक्रिया एवं पाठालोचन पर विस्तृत चर्चा की।

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की कार्यप्रणाली पर प्रस्तुतीकरण – NMM के विशेषज्ञों ने पाण्डुलिपियों के संरक्षण में प्रयुक्त नवीनतम तकनीकों पर व्याख्यान दिया और भविष्य की रणनीति प्रस्तुत की।

भविष्य की कार्ययोजना पर विमर्श – आगामी वर्ष में इस से अधिक पाण्डुलिपियों के डिजिटलीकरण का लक्ष्य रखा गया, साथ ही विश्वविद्यालय में एक डिजिटल पाण्डुलिपि संग्रहालय स्थापित करने की योजना पर विचार किया गया।अतिरिक्त एवं अवशिष्ट पाण्डुलिपियों का डिजिटलीकरण एवं संरक्षण।संरक्षित ग्रंथों का अध्ययन एवं उनके वैज्ञानिक पहलुओं पर शोध को बढ़ावा। ‘डिजिटल पाण्डुलिपि लाइब्रेरी’ की स्थापना जिससे शोधार्थी ऑनलाइन भी अध्ययन कर सकें।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय की पाण्डुलिपियों को शोध के लिए उपलब्ध कराना। पाण्डुलिपि संरक्षण हेतु विश्वविद्यालय में एक विशेष शोध केंद्र की स्थापना।

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्रमुख आचार्यों, शोधकर्ताओं एवं शिक्षाविदों के साथ-साथ राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, नई दिल्ली के वरिष्ठ अधिकारी, भारतीय पुरालेख एवं ग्रंथालय विज्ञान के विशेषज्ञ, एवं संस्कृत अध्ययन से जुड़े प्रतिष्ठित विद्वान उपस्थित रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *