
वाराणसी।भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे और हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य,अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया।
सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के योग साधना केंद्र में श्रवण विद्या संकाय के तत्वोंधान में आयोजित महावीर जयंती मनाया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के जैन दर्शन विभागाध्यक्ष प्रो. प्रद्युम्न शाह सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि जैन ग्रंथों और धार्मिक लिपियों के अनुसार, भगवान महावीर का जन्म चैत्र माह (हिंदू कैलेंडर) के शुक्ल पक्ष की 13 तारीख को बिहार के कुंडलग्राम (अब कुंडलपुर) में हुआ था, जो पटना से कुछ किलोमीटर दूर है। उस समय, वैशाली को राज्य की राजधानी माना जाता था। हालाँकि, महावीर के जन्म का वर्ष विवादित है। श्वेतांबर जैन के अनुसार, महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व में हुआ था, जबकि दिगंबर जैन 615 ईसा पूर्व को उनका जन्म वर्ष मानते हैं। उनके माता-पिता – राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला ने उनका नाम वर्धमान रखा था।
श्वेतांबर समुदाय की मान्यताओं के अनुसार, महावीर की माँ ने 14 स्वप्न देखे थे, जिनकी व्याख्या बाद में ज्योतिषियों ने की, जिनमें से सभी ने कहा कि महावीर या तो सम्राट बनेंगे या ऋषि (तीर्थंकर)। जब महावीर 30 वर्ष के हुए, तो उन्होंने सत्य की खोज में अपना सिंहासन और परिवार छोड़ दिया। वे 12 वर्षों तक एक तपस्वी के रूप में निर्वासन में रहे। इस दौरान, उन्होंने अहिंसा का प्रचार किया और सभी के साथ सम्मान से पेश आए। इंद्रियों को नियंत्रित करने में असाधारण कौशल दिखाने के कारण उन्हें “महावीर” नाम मिला। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि जब महावीर 72 वर्ष के थे, तब उन्हें ज्ञान (निर्वाण) प्राप्त हुआ था।
संगोष्ठी के कार्यवाहक अध्यक्ष तुलनात्मक धर्म दर्शन के विभागाध्यक्ष प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल उद्देश्य आचरणवान बनाता है। भगवान महावीर ने ज्ञान-दर्शन चरित्र की बात कही है। पंच महाव्रत -अहिंसा, सत्य,आचार्य,ब्रम्हचर्य और अपरिग्रह के बारे में बताते हुये कहा की पंचमहाव्रत से एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है। भगवान महावीर के उपदेश विश्व में शांति के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में वैदिक मंगलाचरण छात्र सोनू तिवारी, पौराणिक मंगलाचरण अतिथि अध्यापक डॉ. लेखमणि त्रिपाठी एवं प्राकृत मंगलाचरण डॉ. कमलेश कुमार जैन ने किया । दीप प्रज्वलन एवं भगवान महावीर व माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, मंच पर आसीन अतिथियों के द्वारा किया गया।
स्वागत और अभिनंदन मंच पर आसीन अतिथियों का स्वागत और अभिनंदन माल्यार्पण एवं अंग वस्त्र ओढ़ाकर किया गया।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. रमेश प्रसाद ने किया।
स्वागत प्रो. सुधाकर मिश्र ने किया।
मंगलाचरण छात्र सोनू तिवारी, पौराणिक मंगलाचरण अतिथि अध्यापक डॉ. लेखमणि त्रिपाठी एवं प्राकृत मंगलाचरण डॉ. कमलेश कुमार जैन ने किया ।
विषय उपस्थापन प्रो. हरिशंकर पांडे ने किया।
*कार्यक्रम का संचालन*–प्रो. रमेश प्रसाद ने किया।
उक्त जयंती में मुख्य रूप से प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. हरिशंकर पांडे, प्रो. राम पूजन पांडे, प्रो. महेंद्र पांडे,प्रो. शैलेश कुमार मिश्र,प्रो. दिनेश कुमार गर्ग,डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. सत्येंद्र कुमार यादव, डॉ. राजेश कुमार श्रीवास्तव, डॉ. श्रवण कुमार, डॉ. सूर्यभान कुमार, डॉ. देवात्मा दुवे, डॉ. बालेश्वर झा, बौद्ध भिक्षु, छात्र कर्मचारी व अध्यापक उपस्थित थे।
