पांच दिवसीय लघु कार्यशाला का हुआ समापन

 

वाराणसी।अन्तर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र, बीएचयू, वाराणसी व सूचना एवं पुस्तकालय नेटवर्क केन्द्र, गांधी नगर, गुजरात के संयुक्त तत्वावधान में ‘रिसर्च एथिक्स एंड एकेडेमिक इंटीग्रिटी: लीवरेजिंग डिजिटल टूल्स’ विषय पर पांच दिवसीय लघु अवधि प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन आईयूसीटीई परिसर में हुआ। समापन सत्र का शुभारम्भ मंगलाचरण व मां सरस्वती तथा पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया।

अध्यक्षीय संबोधन आईयूसीटीई के निदेशक, प्रो. प्रेम नारायण सिंह द्वारा किया गया।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई ने बल देते हुए कहा कि शोध की वास्तविक प्रामाणिकता और नैतिकता का आधार शोधकर्ता की व्यक्तिगत ईमानदारी पर ही निर्भर करता है। यदि शोधकर्ता स्वयं सत्यनिष्ठ रहेगा, तभी शोध में नैतिक मूल्यों का समावेश संभव होगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नैतिकता से संपन्न शोध ही समाज को वास्तविक लाभ पहुँचा सकते हैं और समाज से मिली सेवा को सार्थक रूप में समाज को पुनः वापस कर सकते हैं।

अपने उद्बोधन में प्रो. आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख (शिक्षण व शोध), आईयूसीटीई, वाराणसी ने कहा कि आपने यहाँ जो ज्ञान अर्जित किया है, उसे केवल प्रमाणपत्र तक सीमित न रखे, उसे समाज के हित में प्रयोग करें। शोध का उद्देश्य केवल डिग्री नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और जनकल्याण होना चाहिए। वहीं केंद्र के प्रो. अजय कुमार सिंह, आईयूसीटीई, वाराणसी ने मानव, समाज और प्रकृति पर शोध के प्रभाव पर विचार रखते हुए कहा कि नैतिकता और ईमानदारी अंतःकरण से उत्पन्न होती हैं, तकनीकी उपकरण केवल सीमित सहायता प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे साधनों की अपनी सीमाएँ होती हैं, जो मूल मानवीय संवेदनाओं और नैतिक विवेक की जगह नहीं ले सकते। डॉ. सुरभि, सूचना एवं पुस्तकालय नेटवर्क केन्द्र, गांधी नगर ने शोध में नैतिक सिद्धांतों के पालन पर बल देते हुए प्रतिभागियों से कहा कि यहाँ प्रशिक्षण में अर्जित ज्ञान का अपने कार्यक्षेत्र में प्रसार करें। उन्होंने को ज्ञान के नेतृत्वकर्ता बनकर अनुसंधान को जनहित में प्रयोग करने का संदेश दिया।

पांचवें दिन की शुरुआत डॉ. सुरभि, सूचना एवं पुस्तकालय नेटवर्क केन्द्र, गांधी नगर के ‘नेशनल फ़्रेमवर्क्स एंड शोध इनीसिएटिव्स बाई इनफ्लिबनेट सेंटर’ विषय पर व्याख्यान से हुई जिसमें उन्होंने शोध संरचना को सुदृढ़ करने की दिशा में इन पहलों की भूमिका को रेखांकित किया। डॉ. डी.के. सिंह, सयाजीराव गायकवाड़ केन्द्रीय पुस्तकालय, बी.एच.यू., वाराणसी ने ‘यूजिंग डिज़ाइन थिंकिंग मॉडल एंड राइटिंग क्वालिटी रिसर्च फॉर पब्लिकेशन टू अवॉयड प्लागिअरिस्म’ विषय पर महत्त्वपूर्ण व्याख्यान देते हुए कहा कि शोध प्रकाशन में मौलिकता बनाए रखना आवश्यक है और साहित्यिक चोरी से बचाव के लिए प्रभावी उपाय अपनाए जाने चाहिए। इसके अलावा डॉ. कृति त्रिवेदी, सूचना एवं पुस्तकालय नेटवर्क केन्द्र, गांधी नगर ने ऑनलाइन माध्यम से दो अत्यंत व्याख्यान ‘इंट्रोडक्शन टू रिसर्च मेट्रिक्स’ व ‘स्कालर्ली इम्पैक्ट इंडीकेटर्स फॉर पब्लिस्ड वर्क’ विषयों पर दिया और प्रतिभागियों को विभिन्न शोध मेट्रिक्स- एच-इंडेक्स, आई10 मेट्रिक्स, इम्पैक्ट फैक्टर इत्यादि से परिचित कराया और शोध कार्यों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के तरीकों को विश्लेषणात्मक रूप में प्रस्तुत किया।

इस पांच दिवसीय लघु अवधि प्रशिक्षण कार्यक्रम में बिहार, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश सहित 11 राज्यों से 48 प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. चक्रधर राणा व श्री मनोज कुमार के. द्वारा किया गया।

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