जब अस्ताचल की अरुणिमा में घुलती दिनकर की किरण,

तब जाग उठती जन-जन में तप की मधुर स्पंदन।

मिट्टी की गंध में घुला श्रद्धा का सुरभित सार,

घाटों पर जलती लौ कहती — “भक्ति है जीवन का आधार।”

 

छठ नहीं केवल व्रत-वंदना, यह आत्मा का अभिषेक है,

जहाँ प्रत्येक श्वास बनती सूर्य-स्तुति का एक लेख है।

संयम की सरिता में बहता नारी का अटूट प्रण,

उसके तप में चमकता युगों का अमर चेतन।

 

भोर से पहले रसोई में गूँजती स्वर-लहरी,

काँसे के बर्तनों में उबलती लौकी और भात की सादगी ठहरी।

गुड़ और घी से महकता ठेकुआ — प्रेम का प्रतीक,

खीर की मिठास में झलके भक्ति का संगीत।

 

बाँस की सूप में सजे फल-फूल, दीप और अर्घ्य का जल,

हर अन्नकण में झलके नारी का तप, उसका अटल संबल।

हाथों की मेहंदी, नाक से सिन्दूरवा,

रहे सूती धोती का अचरवा

 

संध्या का अर्घ्य — अस्त होते रवि का अभिनंदन,

भोर का अर्घ्य — उदीयमान प्रकाश का वंदन।

दोनों क्षणों में समाहित जीवन का संदेश

अंधकार मिटे जब भीतर, तब जग होता परिवेश।

 

छठ की थाली में है न केवल प्रसाद,

बल्कि दिनकर की झोली में है केवल आशीर्वाद

 

सूर्य की ओर उठे नयन, हृदय में हो प्रकाश,

यही है छठ जिसमें है सब्र,श्रद्धा और विश्वास

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