
कविता से राष्ट्रीय गीत बनने की वंदे मातरम की यात्रा कभी न भूलने वाली है।:- प्रो शैलेश कुमार मिश्र।
वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संस्कृत विद्या विभाग द्वारा राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक वर्ष तक चलने वाले “वंदे मातरम एक गीत, एक भावना, एक भारत” विषय पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने बतौर अध्यक्ष कहा कि वंदे मातरम् न केवल एक गीत है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीयता और संस्कृति का प्रतीक है।
प्रो शर्मा ने कहा कि वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 07 नवम्बर 1875 में की थी,1862 में इसे प्रकाशित किया गया था।और यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रेरणा स्रोत बना। उन्होंने कहा कि यह गीत आज भी देशभक्ति की भावना को प्रबल करता है और हमें अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना सिखाता है। यह गीत भारत की स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रेरणा स्रोत बना,लोगों के अंदर अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना सिखाई। भारत की चेतना सुप्त थी,लेकिन वंदे मातरम् गीत ने इसे जागृत किया।यह गीत भारत की संस्कृति और राष्ट्रीयता का प्रतीक है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और अध्यापकों ने सामूहिक रूप से”वंदे मातरम् गीत” का सामूहिक गायन किया और इस गीत के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।
छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष प्रो शैलेश कुमार मिश्र ने बतौर मुख्य वक्ता कहा कि “वंदे मातरम”, संस्कृत में रचित लेकिन बंगाली लिपि में लिखा गया, आनंदमठ में छह छंदों की एक भक्ति कविता के रूप में प्रकाशित हुआ था। वंदे भारत गीत की रचना के आज 7 नवंबर 2025 को 150 साल हो गए. वंदे मातरम जो कभी देश की आजादी के आंदोलनकारियों का अमर वाक्य रहा, आज भी ये मातृभूमि के लिए हमारे अटूट प्रेम की ये निशानी है. वंदे मातरम का पहली बार बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशन हुआ था. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में इसे आनंदमठ में प्रकाशित किया. राष्ट्रगान जन गण मन के रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीत के सुरों में पिरोया था. एक कविता से राष्ट्रीय गीत बनने की वंदे मातरम की यात्रा कभी न भूलने वाली है।
तुलनात्मक धर्म दर्शन विभाग के पूर्व आचार्य प्रो हरिप्रसाद अधिकारी ने कहा किअमर गीत वंदे मातरम को लिखकर महान साहित्य रचनाकार और स्वतंत्रता सेनानी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय उर्फ बंकिम चंद्र चटर्जी सदैव के लिए अमर हो गए। वंदे मातरम सिर्फ एक गीत या नारा ही नहीं, बल्कि आजादी की एक संपूर्ण संघर्ष गाथा है।
श्रमण विद्या संकाय के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो हरिशंकर पांडेय ने कहा किवंदे मातरम् के माध्यम से लोगों राष्ट्र के प्रति समर्पण और सहयोग की भावना जागृत हुई,एक जनचेतना का वातावरण निर्मित हुआ
कार्यक्रम का आयोजन संयोजक संस्कृत विद्या विभाग के डॉ. रविशंकर पांडेय पांडेय ने संचालन किया।
उक्त अवसर पर विश्वविद्यालय परिवार के डॉ विशाखा शुक्ला के साथ अध्यापक, विद्यार्थियों ने सहभाग किया।
