जन सम्पर्क अधिकारी शशीन्द्र नाथ मिश्रा सहित कई वरिष्ठ जन हुए सम्मानित

 

वाराणसी।युवाओं के लिए आज का दिन कोई साधारण दिन नहीं है, आज का दिन त्याग, तपस्या, समर्पण और कृतज्ञता को ज्ञापित करने का दिन है। हमें आत्ममंथन करने की जरूरत है। आज हमारी प्रगति भौतिक रूप से हो रही है, वहीं आध्यात्मिक प्रगति भी हो रही है, जिसका मुख्य केंद्र काशी में प्रतिष्ठित यह विश्वविद्यालय है, इसके महत्व को समझते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1791 में यहां बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना की। यहां के कर्मठ आचार्यों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के कारण नैक में ए ग्रेड प्राप्त हुआ है।

उक्त विचार सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने 77 वें गणतंत्र दिवस समारोह में ऐतिहासिक मुख्य भवन के समक्ष ध्वजारोहण कर अपने विचार व्यक्त किया।

कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम एक लम्बी कथा है। 26 जनवरी 1930 में लाहौर में रावी के तट पर जब हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने यह संकल्प लिया कि जब तक भारत माता को आजाद नहीं करवा लेते, तब तक चैन से न बैठेंगे और न बैठने देंगे। जब यह संकल्प अपने पूर्णता को प्राप्त हुआ और भारत माँ जो सदियों से पराधीनता की श्रृंखलाओं में बंधी हुई थी, भारत माँ जब आजाद हुई और जब वह क्षण हमारे सामने उपस्थित हुआ, तब देश आन-बान और शान के रूप में यह तिरंगा खुले आसमान में फहराने लगा।लेकिन देश को चलाने के लिए एक तंत्र की, एक विधान की आवश्यकता थी। स्वतंत्र तो हम हो चुके थे, लेकिन अपना एक तंत्र हो, जिस तंत्र के भीतर हम व्यवस्थित होकर आगे बढ़ सकें और देश आगे तरक्की कर सके, इसके लिए संविधान सभा का गठन हुआ। संविधान सभा में बहुत विमर्श करके 2 वर्ष 11 तू माह 18 दिन लगाकर 26 नवंबर 1949 को संविधान का निर्माण कर दिया गया। लेकिन 26 जनवरी 1950 का वह पवित्र दिन जब भारत के अंतिम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से सत्ता का हस्तांतरण हुआ और भारत का अपना नया संविधान इस लोकतान्त्रिक गणराज्य में स्थापित हुआ, वो दिन गणतंत्र के रूप में भारत का पवित्र दिवस स्थापित हुआ।

कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि जहां दुनिया बूढ़ी हो रही है, भारत जवान हो रहा है। मैं प्रायः यह कहता हूं कि जिस तरफ जवानी चलती है, उस तरफ जमाना चलता है। भारत के पास जवानी की ताकत है, दुनिया को मानना पड़ेगा, दुनिया को उस तरफ चलना पड़ेगा जिस तरफ भारत की जवानी चलना तय करेगी। इसलिए भारत की जवानी पर इस देश को गर्व और भरोसा भी है।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि मैं सरकार से अनुरोध करता हूं कि काशी का महत्व बाबा विश्वनाथ जी, उत्तर वाहिनी मां गंगा और संस्कृत से है,संस्कृत को संरक्षित, संवर्धित करने वाली अति प्राचीन संस्था यह विश्वविद्यालय है। इसके बाद के तीन विश्वविद्यालय केन्द्रीय दर्जा प्राप्त कर चुके हैं, किंतु यह प्राचीन संस्था अभी तक केन्द्रीय दर्जा प्राप्त नहीं कर सका है, जिसे केन्द्रीय दर्जा दिया जाना आवश्यक है।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि यह तिरंगा भारत की आत्मा है, हमारी सांस्कृतिक निधि की धरोहर है, यह तिरंगा भारत के चेतना की प्रतीक है, यह तिरंगा भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के समर्पण का प्रतीक है।

उन्होंने सभी अध्यापकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि हम जहां भी हैं, यदि अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करते हैं तो हम देशभक्त हैं। जो व्यक्ति जहां भी है, वह अपने कर्तव्यों का सुचारू रूप से पालन करें, वही राष्ट्र भक्ति है।

आरएसएस के पूर्व प्रान्त कार्यवाह वीरेन्द्र जायसवाल ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि आज 26 जनवरी है, जब भारत का संविधान लागू हुआ। स्वाधीनता के बाद देश को एक व्यवस्था और विधान की आवश्यकता थी। लगभग दो वर्षों के प्रयास से 26 नवंबर 1949 को संविधान बन गया। 26 जनवरी 1950 को इसे लागू करने का निर्णय लिया गया।अंग्रेजों से स्वाधीनता संग्राम चल रहा था, जिसमें कांग्रेस और अन्य दल शामिल थे। क्रन्तिकारियों और समाजसेवियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 31 दिसंबर 1929 को लाहौर में गांधी जी के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज का संकल्प लिया गया था।

कुलपति प्रो शर्मा एवं मुख्य अतिथि ने

कर्मठ आचार्य, अधिकारी, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों में क्रमशः सहायक आचार्य डॉ मधुसूदन मिश्र, जनसम्पर्क अधिकारी शशीन्द्र मिश्र, वरिष्ठ सहायक कौशल झा, प्रदीप कुमार शर्मा, सुश्री शालिनी पांडेय, अंकुर उपाध्याय एवं डूंगर शर्मा को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

समारोह के प्रारम्भ में कुलपति प्रो. शर्मा ने एनसीसी छात्रों की परेड का निरीक्षण, भारत माता की चित्र एवं गांधी जी, नेहरू जी के प्रतिमा पर माल्यार्पण करके ध्वजारोहण के साथ सामूहिक राष्ट्र गान किया गया। संगीत विभाग के द्वारा कुलगीत एवं ध्वज वंदना किया गया।

इस अवसर पर कुलसचिव राकेश कुमार, प्रो. रामपूजन पाण्डेय, प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. हरिशंकर पाण्डेय, प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो रमेश प्रसाद, प्रो. राजनाथ, प्रो महेन्द्र पांडेय प्रो. अमित कुमार शुक्ल, प्रो. विजय कुमार पाण्डेय, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ विशाखा शुक्ला,डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. विजेंद्र आर्य, डॉ. कुज्जबिहारी द्विवेदी, डॉ. दुर्गेश पाठक, डॉ. नितिन आर्य, डॉ रानी द्विवेदी सहित संस्था के अन्य अध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी एवं विद्यार्थियों ने सहभाग किया।

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