खोज करे नित शोध करे,

प्रतिशोध का भाव नहीं मन में I

साथ नहीं हथियार रहे,

तलवार की धार है लेखन में II1II

 

माँ शारदे का करते नित वंदन,

अभिनंदन छंद नई कविता का I

राग न द्वेष न क्रोध धरे मन,

निर्मल जल बहती सरिता का II2II

 

अकाल सुकाल न साँझ – बिहान,

विधान नहीं लिखने पढ़ने का I

गति शील रहे लेखनी सर्वदा,

संकल्प लिए बढ़ते रहने का II3II

 

मित्र, अमित्र, सुमित्र – पवित्र

है, शून्य धरातल सिंधु सजाता I

करुणा मसि- कागज, दान दया,

दुःख दर्द में आँसू सदैव बहाता II4II

 

सामाजिक रीति – कुरीति का दर्पण,

पक्ष- विपक्ष की बात न करता I

स्वच्छ -स्वच्छंद व्यथा मन की,

कविता में सदा लिखता रहता II5II

 

सावन की बदरी, मधुमास की,

मादकता उर में झलके,

स्वार्थ नहीं परमार्थ की धार ही,

काव्य के गागर से टपके II6II

 

राष्ट्र नहीं पर राष्ट्र नहीं,

वह पूर्ण भूमंडल को अपनाता I

भारत का प्रहरी कवि सूर्य,

नरेश और रंक सभी को जगाता II7II

 

कवि इंजी.राम नरेश “नरेश”

वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार

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