विनोबा भावे विश्वविद्यालय में एआई और भारतीय ज्ञान परंपरा पर केंद्रित फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का हुआ शुभारंभ

हजारीबाग। विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में सोमवार को “Equity-Centred Higher Education: Integrating Bhāratīya Jñāna Paramparā and Artificial Intelligence”* विषय पर आयोजित फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम (FDP) का भव्य उद्घाटन हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के समन्वय के माध्यम से समावेशी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना है। IUCTE वाराणसी के सहयोग से आयोजित इस फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम में विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग के शिक्षक भाग ले रहे हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा आचार्य विनोबा भावे के चित्र पर पुष्पार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके उपरांत अतिथियों का स्वागत किया गया। स्वागत वक्तव्य विश्वविद्यालय के सीसीडीसी एवं कार्यक्रम निदेशक प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के अनुरूप भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक का समन्वय शिक्षा को नई दिशा प्रदान करेगा।

कार्यक्रम की विषय-वस्तु पर प्रकाश डालते हुए आईयूसीटीई के कार्यक्रम निदेशक एवं डीन (अकादमिक्स एवं रिसर्च) प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने उच्च शिक्षा में एआई की बढ़ती भूमिका तथा भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की।

विशिष्ट अतिथि के रूप में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के इंडियन नॉलेज सिस्टम (IKS) डिवीजन के राष्ट्रीय समन्वयक Prof. Ganti S. Murthy ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा (आईकेएस) का उद्देश्य भारत और दुनिया की मदद करना है, इसे उच्च शिक्षा में एकीकृत करना है, और यह सुनिश्चित करना है कि यह केवल इतिहास नहीं है, बल्कि एक सतत विकसित होने वाली ज्ञान परंपरा है।

भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि हम 10 अरब लोगों की दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ हमें भोजन, पानी और आश्रय जैसे संसाधनों की आवश्यकता है। यह परंपरा हमें इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है।भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए हमें इसे अनुभव, अवलोकन और अनुमान पर आधारित एक सतत विकसित होने वाले ज्ञान के रूप में देखना होगा। यह व्यक्तिगत और सामूहिक कल्याण पर केंद्रित है।भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान के संरक्षण, प्रसारण और निर्माण पर जोर दिया गया है। यह केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि मौखिक, कलात्मक और प्रदर्शनकारी परंपराओं में भी पाया जाता है।भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान प्राप्त करने के तीन तरीके हैं: प्रथम व्यक्ति पूछताछ (व्यक्तिगत अनुभव), द्वितीय व्यक्ति पूछताछ (दूसरों के साथ बातचीत), और तृतीय व्यक्ति पूछताछ (प्रयोग और अवलोकन)। आधुनिक विज्ञान केवल द्वितीय और तृतीय व्यक्ति पूछताछ पर केंद्रित है।भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान के विभिन्न प्रमाणों को स्वीकार किया जाता है, जैसे प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष अनुभव), अनुमान (अनुमान), शब्द (विश्वसनीय स्रोत), उपमान (तुलना), अर्थापत्ति (धारणा), और अनुपलब्धि (गैर-धारणा)।भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है, ताकि हम एक समावेशी और सतत दुनिया का निर्माण कर सकें। यह केवल पश्चिमी विचारों को भारतीय संदर्भ में ढालना नहीं है, बल्कि भारतीय विचारों को पश्चिमी विचारों के साथ एकीकृत करना है। इसको बढ़ावा देने के लिए शिक्षकों को आचार्य बनना होगा, जो शिक्षा देने के साथ-साथ अपने आचरण से भी सिखाते हैं। इसके लिए अध्ययन, अनुसंधान और पारंपरिक विद्वानों के साथ जुड़ने की आवश्यकता है।भारतीय ज्ञान परंपरा विभाग (आईकेएस डिवीजन) का लक्ष्य भारतीय ज्ञान प्रणालियों को समकालीन दुनिया के लिए प्रासंगिक बनाना, और भारत के ज्ञान परंपराओं के लिए एक स्वस्थ और महत्वपूर्ण सम्मान उत्पन्न करना है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आईयूसीटीई, बीएचयू के निदेशक एवं संरक्षक प्रो प्रेम नारायण सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए भारत को उसके अपने दृष्टिकोण से देखने पर जोर दिया, न कि पश्चिमी दृष्टिकोण से। उन्होंने ‘भारत’ शब्द की व्याख्या ‘भा’ (ज्ञान की देवी सरस्वती) और ‘रत’(ज्ञान साधना में लीन स्थान) के संयोजन के रूप में की, जिसका अर्थ है कि भारत वह स्थान है जहाँ लोग ज्ञान की साधना में निरंतर लीन रहते हैं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख किया कि मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को बाहर निकालना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय मनीषा ने आत्मज्ञान, आत्मविश्लेषण और आत्म-संशोधन पर बल दिया है। ज्ञान को मनुष्य का तीसरा नेत्र बताया गया है, जो सब कुछ देखने और समझने में सक्षम है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ के रूप में लागू करने के बजाय, इसे भारत के चश्मे से देखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी इसी बात पर जोर देती है।

वक्ता ने परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत तैयारी और संस्था के प्रति अपनत्व की भावना पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी कुलपति या निदेशक कुछ वर्षों के लिए होता है, लेकिन फैकल्टी और कर्मचारी लंबे समय तक रहते हैं, इसलिए संस्था को अपना मानना महत्वपूर्ण है।

वक्ता ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को एक साधन बताया और प्रश्न पूछने की कला पर जोर दिया। उन्होंने अंगीरा के प्रश्न का उदाहरण दिया कि “वह कौन सा ज्ञान है जिसे जान लेने के बाद सब कुछ जान लिया जाता है?”वक्ता ने आत्म-विश्वास और अपनी जड़ों, भाषा, संस्कृति और ज्ञान पर विश्वास रखने की बात कही। उन्होंने छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासियों द्वारा कंडी की आंच में बनाए जाने वाले इस्पात का उदाहरण दिया, जिसकी गुणवत्ता अच्छी-अच्छी फैक्ट्रियां भी नहीं बना पातीं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति एवं संरक्षक प्रो चंद्र भूषण शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समन्वय भविष्य की शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी, समावेशी और मानवीय बनाएगा। कुलपति ने भारतीय ज्ञान परंपरा को एक हाथी के समान बताया, जिसे हर कोई अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश करता है। उन्होंने कहा कि इसकी कोई एक परिभाषा नहीं है और हम सभी इसे अपने तरीके से परिभाषित करने के लिए स्वतंत्र हैं।

 

कुलपति ने “आई एम ओके, यू आर ओके” के सिद्धांत पर जोर दिया, जिसका अर्थ है कि हम सभी के सोचने के तरीके और जीवन शैली अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सभी ठीक हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय परंपराएं ही शाश्वत परंपराएं हैं और उन्हें भी महत्व दिया जाना चाहिए।कुलपति ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा एक जीवन शैली है और हमें एक-दूसरे के जीवन में झांककर देखना चाहिए कि कोई ऐसा क्यों करता है। उन्होंने लर्निंग डिसेबिलिटीज पर हुए सेमिनार का भी उल्लेख किया और कहा कि समाज की परेशानियां “आई एम डिफरेंट फ्रॉम यू, आई एम बेटर दैन यू” की सोच के कारण है। कुलपति ने कहा कि विद्यालयों का कोई रंग नहीं होना चाहिए, लेकिन सच बोलने का रंग जरूर होना चाहिए। उन्होंने भारतीय परंपरा में चारवाक, बुद्ध और जैन धर्म को भी स्वीकार करने की बात कही, जो यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा खुले विचारों वाली है।

कुलपति ने कहा कि ज्ञान उम्र से नहीं आता और हमें अपने विश्वविद्यालय में विभिन्न लोगों को बुलाकर उनकी बातें सुननी चाहिए ताकि हम उनसे सीख सकें। उन्होंने झारखंड स्टेट फैकल्टी डेवलपमेंट काउंसिल (जेएसएफडीसी) की स्थापना का भी उल्लेख किया, जिसमें विनोबा भावे विश्वविद्यालय इंडियन नॉलेज सिस्टम पर काम करे।उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में ज्ञान को सूत्रों में रखा गया है, जैसे “सर्वे भवन्तु सुखिनः”, जिसका अर्थ हर व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार निकालता है।

कुलपति ने जातिवाद और छोटे विचारों से ऊपर उठने की बात कही और कहा कि भारतीय परंपरा में हम सभी को समान रूप से स्वीकार किया जाता है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी धरती माँ का सम्मान करना चाहिए, जैसे हम अपनी माँ का करते हैं, और भोजन का एक भी दाना बर्बाद नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हमें पश्चिमी प्रभावों के कारण रूढ़िवादी माने जाने वाली अपनी महान परंपराओं को खुले दिमाग से समझना चाहिए और उन्हें फिर से जीवंत करना चाहिए। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं और आयोजकों को उनके प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया।

कार्यक्रम के अंत में आईयूसीटीई के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. राजा पाठक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। मंच संचालन पीएम ऊषा के नोडल पदाधिकारी डॉ अरुण कुमार मिश्रा ने किया।इस अवसर पर विश्वविद्यालय एवं विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्राचार्य, शिक्षक, शोधार्थी तथा शिक्षाविद बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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