
नई दिल्ली/ वाराणसी ।देश के जनजातीय समुदायों के समग्र शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय उत्थान की दिशा में आज एक ऐतिहासिक एवं दूरगामी महत्व का अध्याय जुड़ गया, जब जनजातीय कार्य मन्त्रालय, भारत सरकार तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के मध्य जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से विकसित प्रमाणपत्रीय एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के संचालन एवं क्रियान्वयन हेतु एक औपचारिक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
नई दिल्ली स्थित जनजातीय कार्य मन्त्रालय में आयोजित गरिमामयी समारोह में यह समझौता जनजातीय कार्य मन्त्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा, संयुक्त सचिव श्री अनन्त प्रकाश पाण्डेय, निदेशक श्रीमती दीपाली मसीर्कर तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो॰ बिहारी लाल शर्मा की गरिमामयी उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।
यह समझौता केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के भविष्य को नई दिशा प्रदान करने वाला एक दूरदर्शी राष्ट्रीय संकल्प है। इसका मूल उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा के अभाव के कारण बच्चों के मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक एवं सामाजिक विकास पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का प्रभावी निराकरण करते हुए उन्हें गुणवत्तापूर्ण, संस्कारनिष्ठ एवं जीवनोपयोगी शिक्षा से जोड़ना है।
इस अभिनव पहल के अंतर्गत जनजातीय कार्य मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के शैक्षिक एवं अकादमिक सहयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के मानकों के अनुरूप अनेक प्रमाणपत्रीय (Certificate) एवं डिप्लोमा (Diploma) पाठ्यक्रमों का निर्माण किया गया है। इन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार अभिकल्पित किया गया है कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विशिष्टता, मातृभाषाओं, परम्परागत ज्ञान एवं जीवन-मूल्यों का संरक्षण करते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, कौशल विकास, व्यक्तित्व निर्माण तथा रोजगारोन्मुख शिक्षा का समन्वित विकास सुनिश्चित किया जा सके।
इन पाठ्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य जनजातीय बालकों एवं युवाओं में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, राष्ट्रबोध एवं ‘भारत बोध’ की सशक्त भावना का विकास करना है। साथ ही उनकी अंतर्निहित प्रतिभा, सृजनशीलता एवं रचनात्मक क्षमताओं को विविध कला, शिल्प, लोकज्ञान, कौशल एवं प्रशिक्षण के माध्यम से परिष्कृत कर उन्हें समाज एवं राष्ट्र के विकास में सक्रिय सहभागी बनाना भी इस योजना का प्रमुख लक्ष्य है।
समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारत की जनजातीय परम्पराएँ, भाषाएँ, लोककलाएँ एवं जीवन-दर्शन भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण का समन्वय ही जनजातीय समाज के सतत एवं समावेशी विकास का आधार बन सकता है। यह समझौता इसी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि का मूर्त रूप है।
इस अवसर पर कुलपति प्रो॰ बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय अपने स्थापना काल से ही भारतीय ज्ञान-परम्परा, सांस्कृतिक विरासत एवं मानवीय मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति समर्पित रहा है। जनजातीय कार्य मन्त्रालय के सहयोग से प्रारम्भ की जा रही यह अभिनव पहल न केवल जनजातीय समाज के लिए नवीन अवसरों का सृजन करेगी, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के मध्य एक सशक्त सेतु का निर्माण भी करेगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से जनजातीय युवाओं में नेतृत्व क्षमता, जीवन-कौशल, सांस्कृतिक गौरव एवं आत्मनिर्भरता की भावना का अभूतपूर्व विकास होगा, जिससे वे विकसित भारत के निर्माण में सार्थक योगदान दे सकेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 की मूल भावना के अनुरूप यह पहल शिक्षा को स्थानीय संस्कृति, मातृभाषा, कौशल विकास एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली से जोड़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे जनजातीय समाज की नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक युग की चुनौतियों का आत्मविश्वासपूर्वक सामना करने में सक्षम होगी।
यह समझौता भारत सरकार की उस समावेशी विकास-दृष्टि का सशक्त प्रतीक है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर एवं सांस्कृतिक सम्मान पहुँचाने का संकल्प निहित है। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक संरक्षण तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में यह पहल निश्चित रूप से एक मील का पत्थर सिद्ध होगी।

राष्ट्रीय शिक्षा, जनजातीय सशक्तीकरण एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा के समन्वय की दिशा में यह ऐतिहासिक समझौता देश के जनजातीय समुदायों के उज्ज्वल भविष्य के लिए नई आशाओं, नवीन संभावनाओं एवं व्यापक परिवर्तन का आधार बनेगा।











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