
वाराणसी।विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला आज के आधुनिक युग में भी श्रद्धावान नागरिकों एवं युवा मन को आज भी अपने पुराने रीति मशाल, कागज़ से बने पुतले , बिना ध्वनि यंत्र के इस रामलीला का अलग ही महत्व रखता है।
आज से लगभग दो सौ चालीस वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत महाराजा ईश्वरी नारायण जी ने किया।
इस रामलीला की शुरुआत के प्रति भी एक ऐसी बात जो कम ही लोगों को मालूम है,सुनी सुनाई बात है, रामनगर किले से लगभग सात किलोमीटर दूर छोटे मीरजापुर के एक व्यापारी रामलीला का मंचन कराया करते थे ।
जिसमें महाराज अपने लश्कर के साथ उसमें सम्मिलित होने जाते थे,एक बार महाराज को शासकीय कार्य के कारण वहां जानें में विलंब हो गया,जब महाराजा वहां पहुंचे तो देखा कि रामलीला का मंचन हो गया था,इस बात ने महाराजा के मन में रामनगर में रामलीला करवानें का फैसला किया और वो भी रामलीला के सभी पात्र और जगहों का निर्धारण बड़े ही सात्विक ढंग से किया जायेगा।
आज भी राम,सीता लक्ष्मण भारत शत्रुघ्न के पात्रों को चयन करते समय उनकी आवाज, बोलने के ढंग और महीना भर उन्हें अत्यंत सात्विक आहार के साथ उन्हें आदरपूर्वक सम्मान के साथ रहने की व्यवस्था काशी राज परिवार की ओर से होती है।
रामनगर की पक्की पर गणेश चतुर्दशी के दिन से विधिवत् गायन होता है और प्रथम दिन दुर्गा मंदिर के तालाब पर रावण जन्म के साथ इसकी शुरुआत होती जिसमें हरि जी कीआरती होती, रामलीला का मंचन एक निर्धारित स्थान में न होकर विभिन्न स्थलों पर किया जाता है।जैसे प्रभु का जन्म अयोध्या, स्वंयवर की जगह जानकी मंदिर,कौआ युद्ध नाककटैया केवट मिलन एवं पंचवटी पर और जब रावण सीता हरण करते तो जटायू युद्ध और फिर लंका इस प्रकार अन्य भी स्थान जहां जहां पर रामलीला के मुख्य संवाद होते वहां वहां लीला बढ़ती रहती।
नागरिकों के संज्ञान में लाना चाहता हूं कि रामलीला में प्रतिदिन काशी राज के राजाश्री अनन्त नारायण जी अपने पुत्र के साथ उपस्थित रहते।और रामलीला में आरती दर्शन के बाद वापस होते।
रामनगर की रामलीला में आरती का अत्यधिक महत्व है और कई श्रद्धालु उस आरती के समय प्रभू राम के दर्शन कर अभिभूत होते, रामलीला में काफी दूर दुराज से लोग मेला देखने आते हैं। श्रद्धावान तो सम्पूर्ण लीला में आरती दर्शन अवश्य करते चाहे कितना भी आवश्यक काम हो, महीने भर वो आरती दर्शन कर प्रभू राम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता, प्रगट करते और प्रति वर्ष वो आरती दर्शन करें ऐसी प्रार्थना भी करते।
रामलीला रामनगर की आज भी काशी राज महाराज अपने पूर्वजों के द्वारा स्थापित इस सात्विक लीला को करवाने हेतु दृढ़ संकल्पित है।
इस रामलीला में आरती के लिए मेहताबी या कागज के बने पुतले मोमिन परिवार ही वर्षों वर्ष से करता आ रहा,, काशी राज परिवार के पुस्तकालय में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी भी विराजमान हैं जो कि गुरुओं की हस्तलिखित एतिहासिक धरोहर है।
रामलीला के समय में ही श्री गुरु नानक देव जी का श्राद्ध के दिन काशी राज परिवार रामनगर के सिख समुदाय को विशेष निमंत्रण देकर किले में बुलाते हैं और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाढ कीर्तन और अरदास सिख संगत द्वारा किया जाता है जिसमें महाराज स्वयं उपस्थित होते हैं,सिख संगत उनके लिए अरदास भी करती है और महाराज के स्वस्थ यश की अरदास करती है, लाखों की भीड वाले इस रामलीला में राज्याभिषेक का अलंग ही महत्व है,जब रावण को पराजित कर प्रभू राम अयोध्या लोटते तो एक महीने की इस रामलीला का उत्कर्ष राज्याभिषेक के दिन होता,उस दिन भोर के समय आरती होती लाखों की भीड उस आरती दर्शन को कर अभिभूत हो जाते और उस दृश्य को अपने ह्रदय में बसाने का प्रयास करते।
काशी राज परिवार उस दिन पैदल ही दर्शन के लिए आते हैं और श्रद्धालु बोल दे राजा राम चंद्र की जय का जयकारा लगाते हुए अपने को धन्य महसूस करते हैं।इसी दिन किले में काले हनुमान जी के दर्शन के लिए नागरिकों को किले के अन्दर बने इस दुर्लभ मंदिर के दरवाजे खोल दिए जाते और श्रद्धालू दर्शन कर धन्य होते,,
राज्याभिषेक के बाद सनक सनंदन की लीला किले के प्रांगण में होती जिसमें सभी पात्रों को काशी राज धन्यवाद के साथ विदाई देते हैं,
प्रभू राम से मेरी भी प्राथना है कि काशी राज परिवार में सुख समृद्धि बल यश दे जिससे कि अपने पूर्वजों की धरोहर को संजोकर रखे।
सरदार कुलदीप सिंह,, काशी रत्न,,
एम, ए, समाज शास्त्र,,

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