
स्वामी अमृतानन्द सरस्वती महाराज ने कहा— वेदों की रक्षा ब्राह्मण ग्रन्थों के माध्यम से ही सम्भव
वाराणसी। धर्म एवं अध्यात्म की नगरी काशी के हनुमान घाट स्थित कांची कामकोटीश्वर मंदिर में श्री शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा कण्ठस्थ दण्डक्रम पारायण का शुभारम्भ परमपूज्य स्वामी श्री अमृतानन्द सरस्वती जी महाराज के करकमलों द्वारा दीपप्रज्वलन एवं स्वस्तिवाचन के साथ विधिवत् सम्पन्न हुआ।
यह आयोजन महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान पुणे, एवं समर्थ ाद्वैत पाठशाला, त्र्यम्बकेश्वर के तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है।
उद्घाटन सत्र में अपने उद्बोधन के दौरान स्वामी अमृतानन्द सरस्वती महाराज ने वेदों के संरक्षण, संवर्धन एवं परम्परागत ज्ञान के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए प्रतिपादन किया कि वेदों की सुरक्षा ब्राह्मण ग्रन्थों और अर्थशास्त्र के माध्यम से ही सम्भव होगी।
उन्होंने वैदिक परम्परा को सुरक्षित रखने तथा अगली पीढ़ी तक प्रामाणिक रूप में पहुँचाने के लिए पारम्परिक अध्ययन, अभ्यास और विद्वानों के मार्गदर्शन को महत्त्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम में जगद्गुरु स्वामी श्री विजयेंद्र सरस्वती जी महाराज एवं स्वामी श्री गोविन्द देव गिरि जी महाराज के आशीर्वाद एवं प्रेरणा का स्मरण किया गया।
उद्घाटन सत्र में आचार्य प्रो. हृदयरंजन शर्मा, आचार्य प्रो. श्री किशोर मिश्रा, आचार्य प्रो. राजाराम शुक्ल, आचार्य पी. एच. सुब्रमण्यन, आचार्य प्रो. रविन्द्र मुळे तथा आचार्य प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी सहित अनेक विद्वज्जन उपस्थित रहे।
वाराणसी के महापौर अशोक कुमार तिवारी जी , श्री के. वेंकटेरमण घनपाठी एवं श्रीमान राकेश तिवारी जी की भी विशिष्ट उपस्थिति रही।
इस अवसर पर वैदिक मन्त्रों के सस्वर पाठ और पारम्परिक विधि-विधान के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। चिरंजीव अद्वैत एवं चिरंजीव समर्थ ने कण्ठस्थ वैदिक पाठ-परम्परा के प्रति अपनी साधना एवं समर्पण का परिचय दिया।
कार्यक्रम के संयोजक वेदमूर्ति शैलेन्द्र काकड़े गुरुजी एवं वेदमूर्ति डॉ गजानन ज्योतकर गुरुजी हैं। परीक्षक के रूप में वेदभास्कर प्रशांत जोशी गुरुजी तथा वेदमूर्ति किरण पाठक गुरुजी का मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है।
यह आयोजन शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा की दण्डक्रम पाठ-परम्परा के संरक्षण, वैदिक विद्वत्ता के संवर्धन तथा युवा पीढ़ी में वेदाध्ययन के प्रति रुचि जागृत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। काशी की प्राचीन विद्या-परम्परा में यह आयोजन वैदिक संस्कृति की निरन्तरता और गुरु-शिष्य परम्परा की महत्ता को पुनः रेखांकित करता है।

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