“यावन्ति वेदाक्षराणि तावन्ति हरिनामानि” — वेद का प्रत्येक अक्षर भगवान के नाम के समान पवित्र

पंचम दिवस का सफलतापूर्वक समापन

 

काशी। काशी की आध्यात्मिक एवं वैदिक नगरी में श्री काशी कामकोटिश्वर मंदिर, हनुमान घाट पर आयोजित ऐतिहासिक श्री शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा कण्ठस्थ दण्डक्रम पारायण के पंचम दिवस का श्रद्धा एवं वैदिक गरिमा के साथ सफलतापूर्वक समापन हुआ।

 

यह आयोजन कांची कामकोटि पीठ के पूज्य शंकराचार्य स्वामी श्री शंकर विजयेंद्र सरस्वती जी महाराज तथा पूज्य स्वामी श्री गोविंद देवगिरि जी महाराज के आशीर्वाद एवं संरक्षण में, महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान, पुणे तथा समर्थाद्वैत पाठशाला, व्यंकटेश्वर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है।

 

पंचम दिवस पर वैदिक विद्वानों एवं विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। विशेष रूप से श्री ईश्वर घनपाठी जी, श्री वीर राघव घनपाठी जी, श्री भीमशंकर घनपाठी जी, श्री प्रेम नारायण त्रिपाठी जी तथा श्री मृत्युंजय त्रिपाठी जी सहित अन्य गणमान्य विद्वान एवं अतिथिगण उपस्थित रहे। श्री वेंकट रमण घनपाठी जी की भी विशेष उपस्थिति रही।

 

इस अवसर पर श्री वीर राघव घनपाठी जी ने वैदिक परंपरा में अग्निहोत्र आदि यज्ञीय कर्मों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इन परंपराओं का संरक्षण एवं निरंतर पालन हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

 

वहीं श्री ईश्वर घनपाठी जी ने वेदों के संरक्षण की कठिन साधना और उसके महत्व पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वेदों की रक्षा करना अत्यंत कठिन एवं उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए वर्षों की तपस्या, अनुशासन, निष्ठा और समर्पण की आवश्यकता होती है। उन्होंने उपस्थित जनों एवं विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे केवल शाखा के विशेष क्रम का ही अध्ययन न करें, बल्कि वेद की मूल संहिता का भी नियमित अध्ययन करें।

 

उन्होंने वैदिक महिमा को स्मरण कराते हुए कहा—

 

“यावन्ति वेदाक्षराणि तावन्ति हरिनामानि।”

 

अर्थात् वेद के जितने अक्षर हैं, उतने ही भगवान के नाम हैं। इसलिए वेद का प्रत्येक अक्षर पवित्र एवं कल्याणकारी है।इस अवसर पर वरिष्ठ

आरएसएस के प्रचारक जयंती शाह जी भी उपस्थित थे l

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी विद्वानों, अतिथियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया गया। तत्पश्चात सभी उपस्थित जनों के बीच श्रद्धापूर्वक प्रसाद वितरण किया गया।

 

इस ऐतिहासिक आयोजन के माध्यम से युवा पीढ़ी में वेदाध्ययन, वैदिक संस्कार एवं प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के प्रति जागरूकता का संदेश दिया जा रहा है।

 

कार्यक्रम के संयोजक वैदिक विद्वान शैलेन्द्र काकड़े गुरुजी एवं वैदिक विद्वान गजानन ज्योतकर गुरुजी हैं।

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