
वाराणसी। धर्म एवं आध्यात्म की नगरी काशी में हनुमान घाट स्थित कांची कामकोटि पीठ में कांची कामकोटि पीठ के परमपूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री शंकर विजयेंद्र सरस्वती स्वामीजी महाराज एवं पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज के पावन आशीर्वाद, संरक्षण एवं मार्गदर्शन में आयोजित श्री शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा के कण्ठस्थ दण्डक्रम पारायण में बुधवार को परमपूज्य प्रखर जी महाराज का पावन आगमन हुआ।
इस अवसर पर परमपूज्य प्रखर जी महाराज ने वेदों की महत्ता, वैदिक परंपरा एवं वेदांगों के अध्ययन की अनिवार्यता पर अत्यंत प्रेरणादायी वक्तव्य एवं आशीर्वचन प्रदान किए।
उन्होंने विशेष रूप से कहा कि वेदांगों के ज्ञान एवं अध्ययन के बिना वेदों का समुचित संरक्षण संभव नहीं है। वेदों के शुद्ध स्वर, उच्चारण एवं प्राचीन ऋषि परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए वेदांगों का अध्ययन एवं संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। उनके प्रेरणादायी विचारों से उपस्थित संतों, विद्वानों एवं वेदपाठी बटुकों को विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
इस गरिमामय अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक माननीय श्री दिनेश चंद्र जी, विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री आलोक कुमार जी, विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष जी, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं प्रख्यात विचारक माननीय श्री सुनील देवधर जी तथा कैंट विधानसभा के माननीय विधायक श्री सौरभ श्रीवास्तव जी सहित विश्व हिंदू परिषद के अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी, जिला एवं प्रांत के पदाधिकारी तथा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
पारायण के परीक्षक के रूप में वेदभास्कर प्रशांत जोशी गुरुजी एवं वेदमूर्ति किरण पाठक गुरुजी की गरिमामयी उपस्थिति रही।
इस अवसर पर श्री अद्वैत शैलेन्द्र काकड़े जी द्वारा नित्य की भाँति अत्यंत अद्भुत एवं सराहनीय ढंग से दण्डक्रम पारायण किया गया। उनकी वैदिक साधना, निष्ठा एवं समर्पण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।
इस ऐतिहासिक आयोजन के संयोजक एवं प्रमुख सहयोगकर्ताओं के रूप में श्री के. वेंकट गणपति जी, श्री शैलेन्द्र काकड़े जी तथा डॉ. गजानन जोतकर जी का विशेष योगदान एवं समर्पण रहा। इनके साथ अनेक विद्वानों, संत-महात्माओं एवं समर्पित कार्यकर्ताओं ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
काशी की पावन धरती पर आयोजित यह ऐतिहासिक दण्डक्रम पारायण भारतीय ऋषि परंपरा, गुरु-शिष्य परंपरा एवं सनातन वैदिक ज्ञान की अमूल्य विरासत को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
संतों के आशीर्वचन, विद्वानों का मार्गदर्शन एवं वेदपाठी बटुकों की कठोर साधना इस आयोजन को विशेष गौरव प्रदान कर रही है।
वेदों की दिव्य परंपरा अक्षुण्ण रहे, वैदिक ज्ञान की ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहे और सनातन संस्कृति की महान विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचती रहे।

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