अब नहीं वह सुख जिसे हम घर में अपने ढूढ़ते ,

मां के जैसे हाथ की थपथपियां सिर पर ढूढ़तेI

वाणी में सीतालता -मधुर मुस्कान अधरों पर नहीं,

सब कुछ है अपने पास फिर भी दूर जाकर ढूढ़ते II

 

नीम – पाकर और बरगद अब कहाँ पीपल धरा पे,

घनी अमराई, बगीचे- बाग गायब हैं धरा पे I

गाँव के चौपाल,जुम्मन चौधरी, – बोधई, नहीं,

खड़ी दुपहरिया में अब हम फ्रीज़ कूलर ढूढ़ते II

 

विकसित शहर और गाँव हरियाली भी उतनी है जरूरी,

शुद्ध आक्सीजन, हवा- पानी भी तो सबको जरूरी I

अनुपात कटने और लगने के हैं झूठे कागजों पर,

सूखी नदी, तपती शिला में क्यों हिमांचल ढूढ़ते II

भूमि बंजर या जुताऊ सब में पौधा रोप दें,

फलदार या फिर हरे पेड़ों को धरा पर रोप दें I

संतुलित पर्यावरण होगा जब जमीं- आकाश का,

नई ऊर्जा घर मे तब ,बाहर नहीं कुछ ढूढ़ते II

 

कवि राम नरेश ‘नरेश

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