भगवान सदाशिव ही योग के प्रथम आविष्कारक
मिर्जापुर। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के पूर्वसंध्या में आनन्द मार्ग राजाधिराज योग केंद्र मेंअष्टाक्षरी सिद्ध महा मंत्र “बाबा नाम केवलं “अखंड कीर्तन का एकप्रहरी मधुरमय गायन के उपरांत प्रशिक्षार्थी के बीच पद्मासन, दीर्घप्रणाम, अग्निसार, शशांकासन, पदहस्तासन, कौशिकी नृत्य एवं तांडव नृत्य का अभ्यास कराया गया ।इस अवसर पर योग प्रशिक्षक आचार्य संजीवानंद अवधूत जी ने बताया कि भगवान सदाशिव ही योग के प्रथम प्रतिपादक थे उन्होंने ही अष्टांग योग का आविष्कार किया था ।स्वस्थ रहने के लिए और ईश्वर मुखी होने के लिए मनुष्य को आसन का अभ्यास करना चाहिए ।उन्होंने बताया कि जीव के साथ परमात्मा का मिलन ही असली योग है।
जीवात्मा का परमात्मा के साथ एकाकार होने का नाम ही योग है जिस तरह पानी और चीनी को मिलाने से एकाकार हो जाता है । यानि मिलने के बाद चीनी और पानी का अलग अस्तित्व नहीं रहता उसी तरह अध्यात्मिक साधना के माध्यम से जब साधक परमात्मा के साथ मिलकर एक हो जाता है ।उस समय म परमात्मा का बोध का अस्तित्व नहीं रहता।
आनन्द मार्ग के *योग साधना में जीवात्मा को परमात्मा के साथ मिलाने की जो अध्यात्मिक साधना की प्रक्रिया है वही है योग .। आसन करने से शरीर और मन स्वस्थ रहता है यह ग्रंथि दोष को दूर करता है ।आसन करने से मन अप्रिय चिंता से दूर हो जाता है या शुभ और उच्च कोटि के साधना में काफी मददगार साबित होता है। नियमित आसन करने से शरीर में लचीलापन होता है योग करने से शरीर और मन का संतुलन बना रहता है ।प्रणायाम एक श्वास की प्रक्रिया है जो श्वास नियंत्रण के साथ ईश्वर भाव आरोपित करता है।बुद्धिमान मनुष्य शैशव काल से ही ध्यान करें तो ज्यादा अच्छा है क्योंकि मनुष्य का शरीर दुर्लभ है उससे भी अधिक दुर्लभ है वह जीवन साधना करने के द्वारा सार्थक हुआ है ।हर कर्म उचित समय पर करना चाहिए उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आषाढ़ के महीने में धान की रोपनी होनी चाहिए और अगहन मैं कटनी कोई अगर अगहन में रो पनी करे तो मुश्किल हो जाएगा काम नहीं होगा ठीक वैसे ही कोई मनुष्य अगर सोचे कि बुढ़ापे में ध्यान करें साधना करेंगे यह बहुत ही बड़ी भूल होगी। बुढ़ापा हर मनुष्य के जीवन में नहीं आएगा यह भी हो सकता है कि कल का सूर्योदय हर जीवन में ना हो इसलिए कोई भी काम कल के लिए नहीं छोड़ना चाहिए ।जो कुछ भी अच्छा काम करने की इच्छा होती है तुरंत कर लेना चाहिए। मनुष्य में थोड़ा बहुत ज्ञान थोड़ी बहुत बुद्धि का उदय होता है चार पांच साल की उम्र में ही सही साधना मार्ग में आ जाना चाहिए। ध्यान के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि ध्यान करने से मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ता है एवं जो डिप्रेशन के शिकार लोग हैं उनके लिए यह बहुत बड़ी चिकित्सा है।
आचार्य संजीवानंद अवधूत (सी टी एस वाराणसी) राजाधिराज योग प्रशिक्षण केन्द्र
आराजीलाइन, साधुघाट, अदलपुरा चुनार रोड जिला मिर्जापुर 231304
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