
खेलों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक का विकास होगा– कुलपति
वाराणसी।भारतीय ज्ञान परंपरा में खेलों को स्वीकार करने का एक गहरा अर्थ है। खेल न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए भी आवश्यक हैं।
उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने आज भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में विभिन्न खेलों के तत्वों पर प्रकाश डालते हुए व्यक्त किया।
कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि इस सप्ताह के अन्त में गिली डंडा का पारम्परिक खेल के रूप में आयोजन किया गया था, जिसकी विशेषता एवं चर्चा उत्तर की महामहिम कुलाधिपति एवं श्री राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल ने भी व्यक्तिगत सराहना कर प्राच्यविद्या के महत्व को अग्रसारित किया।
इस तरह देशभर से पारम्परिक खेलों के महत्व की सराहना किया जा रहा है।इसलिये यह संस्था अनवरत पारम्परिक खेल को बढावा देने के लिए संकल्पित होकर कार्य कर रहा है।शीघ्र ही इससे जुड़े विभिन्न खेलों को खेलने का एक रूपरेखा तैयार किया जा रहा है।
कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में खेलों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है।शारीरिक खेल: जैसे कि कुश्ती, मल्लयुद्ध, और घुड़सवारी।मानसिक खेल: जैसे कि शतरंज, चौपड़, और तर्कशास्त्र।आध्यात्मिक खेल: जैसे कि योग, ध्यान, और प्राणायाम।
इन खेलों के माध्यम से व्यक्ति अपने शरीर, मन, और आत्मा को विकसित कर सकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में खेलों को स्वीकार करने से व्यक्ति को जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में मदद मिलती है।
खेलों के महत्व को समझने के लिए हमें भारतीय ज्ञान परंपरा के महान ग्रंथों जैसे कि वेद, उपनिषद, और भगवद्गीता का अध्ययन करना चाहिए। इन ग्रंथों में खेलों को जीवन का एक अभिन्न अंग माना गया है।
आज के समय में खेलों को स्वीकार करने की आवश्यकता है ताकि हम अपने जीवन को संतुलित और सफल बना सकें। भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में खेलों को स्वीकार करने से हमें जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
