वाराणसी। आर्य समाज भोजूबीर में राष्ट्र के समृद्धि, उन्नति व शान्ति हेतु विशेष मंत्र यज्ञ की आहुति से यज्ञ हुआ । इस अवसर पर जिला आर्य प्रतिनिधि सभा वाराणसी-चन्दौली व महर्षि दयानन्द काशीशास्त्रार्थ स्मृति न्यास के अध्यक्ष प्रमोद आर्य ‘आर्षेय’ ने सभी देशवासियों व क्षेत्रीय नागरिकों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आज हमारा भारत देश 77वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है । इस शुभ अवसर पर हम सब उन महान स्वतंत्रता सेनानियो को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने इस महान कार्य में अपना सब कुछ बलिदान कर दिया । उन स्वतंत्रता आन्दोलन के वीर सिपाहियों को स्मरण करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते है, लेकिन इस पावन पर्व पर स्वतंत्रता आंदोलन के महा मानव ऋषि को याद न करना उनके प्रति कृत्घ्नता होगी । इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्रता आंदोलन में ऋषि के भक्तों ने सबसे अधिक योगदान दिया ।ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने ही “अर्चन्नुम् स्वराज्यम्” ऋग्वेद के अनुसार तिलक जी से पचास वर्ष पहले ही स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया था । सन 1855 में ऋषि ने ही अपने गुरुओं के साथ हरिद्वार में बैठ कर देश को विदेशियो से मुक्त कराने के लिए सभी देशी राजाओं को संगठित किया और घूम-घूम कर देश के लिये लड़ने की प्रेरणा दीं । सन् 1865 में ऋषि ने ही सबसे पहले देशवासियों में स्वदेशी वस्तु का प्रयोग करने की प्रेरणा दीं । सन 1905 में ऋषि की प्रेरणा से अमर क्रांतिकारी श्याम जी कृष्ण वर्मा जी ने इंग्लैंड में जाकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए इण्डिया हाउस की स्थापना कीं व अपनी कोठी दान में दीं । वीर सावरकर, मदनलाल ढींगरा, हरदयाल, एम.ए. तथा विदेश में सर्वप्रथम भारत का ध्वज फहराने वाली वीरांगना श्रीमती कामा को देश भक्ति की प्रेरणा देने वाले श्याम जी कृष्ण वर्मा जी ऋषि को ही गुरु मानतें थें । सन् 1860 में महारानी द्वारा जारी घोषणा पत्र का विरोध ऋषि ने ही यह कहकर किया कि “चाहे कोई कितना भी करे, परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि होता है ।” अथवा ‘मत मतान्तर के आग्रह रहित, अपने पराये का पक्षपात शून्य, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा न्याय और दया के साथ विदेशी राज भी सुखदायक नहीं होता ।’ सन 1876 में ऋषि ने ही अपने भाष्य में लिखा कि जो राजा जनता के हितों की रक्षा नहीं करता और उसके धर्म की रक्षा नहीं करता, प्रजा उसे कर न दे । अपने ग्रंथ आर्याभिविनय में ऋषि ने ही कहा कि ईश्वर हम पर कृपा करे कि हमारे देश में अपने ही लोग राज्य करें और विदेशी यहाँ से चले जायें । ऋषि के शिष्य अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानन्द जी ने ही केवल 4अप्रैल 1919 को दिल्ली की जामा मस्जिद में “त्वं ही न पिता…” इस वेदमन्त्र का पाठ करके उपदेश दिया । ऋषि के शिष्यों ने ही हिन्दू से मुस्लिम बने गांधीजी के पुत्र हीरा लाल जी को शुद्ध करके पुनः हिन्दू बनाया । सन 1880 में ऋषि ने ही सच्चा आर्य गौ भक्त बनकर विश्व में सर्वप्रथम गौ माता का महत्त्व बताने के लिए गौ करुणानिधि पुस्तक लिखी । सन् 1857 के संग्राम के नायक नाना साहब जी को आत्महत्या करने से बचाकर संन्यास देने वाले ऋषि दयानन्द ही थें । शिक्षा का मूल उद्देश्य चरित्र, धर्म, देश भक्ति व ज्ञान से युक्त तथा अज्ञान व पाखंड से मुक्त एक सच्चे इन्सान का निर्माण करना ऋषि ने ही बताया । तत्पश्चात ध्वजारोहण किया गया । इस अवसर पर सुनील जायसवाल, सुशील आर्य, वेद प्रकाश आर्य, चन्द्रदीप आर्य, नितिन बरनवाल, रवि प्रकाश बरनवाल, चन्द्र पाल सिंह, परमानन्द आर्य आदि उपस्थित थें ।

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