
विद्या निवास मिश्र शताब्दी वर्ष: काशी में हिंदी साहित्य पर विशेष चर्चा
वाराणसी। एलटी कालेज स्थित राजकीय पुस्तकालय में रविवार को पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संकल्पित आयोजनों की शृंखला में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा’ के छठे चरण के रूप में हिंदी साहित्य को शिवरानी देवी और जयशंकर प्रसाद जी के प्रदेयों पर केंद्रित गंभीर परिचर्चा संपन्न हुई। अतिथियों द्वारा वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण, कंचन सिंह परिहार द्वारा मंगलाचरण और अतिथियों के स्वागत से इस सारस्वत आयोजन का शुभारंभ हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र के स्वागत-भाषण ने स्वागत के साथ ही विषय-प्रस्ताव का दायित्व भी निभाया। डाॅ. शुभ्रा श्रीवास्तव ने साहित्य के क्षेत्र में कम चर्चित रही शिवरानी देवी के अप्रतिम योगदान को रेखांकित किया। डाॅ. शुभ्रा ने ‘शिवरानी देवी रचनावली’ के संपादन के रोचक अनुभवों को भी साझा किया। आजादी की लड़ाई में वे जेल भी गईं और जेल में भी सभी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ समान व्यवहार हो, इसके लिए लगातार धरना दिया। कृतित्व और व्यक्तित्व दोनो स्तरों पर उन्होंने एक योद्धा की भूमिका निभाई। साहित्य को प्रसाद जी के योगदान के ज्ञात-अज्ञात अनेक पक्षों को प्रो. कमलेश वर्मा ने अपनी प्रतिष्ठित कृति ‘प्रसाद काव्य-कोश’ के हवाले गंभीर विमर्श का विषय बनाया। प्रसाद के यहाँ ऐसा कोई शब्द नहीं, जो अबूझ हो, जिसकी कोई परंपरा न हो। विशेषण-विशेष्य के विशिष्ट प्रयोग उन्होंने किए। कुछ ऐसे भी शब्द हैं जो प्रसाद को विशेषत: प्रिय हैं और उन्होंने उनका बहुविध उपयोग किया है, जैसे मधु, नील आदि। कुछ ऐसे भी शब्द हैं जिनका उपयोग छायावादी कवियों में प्रसाद ने ही किया, और बाद के रचनाकारों ने उन्हें हाथोहाथ लिया। दलित-विमर्श में आज जो बहुचर्चित शब्द है, ‘आजीवक’, वह भी हिंदी में प्रसाद जी का लाया हुआ है। ‘यायावर’ भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसे प्रसाद जी संस्कृत से ले आए। इस आयोजन में प्रसिद्ध आलोचक प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने शिवरानी देवी का संदर्भ लेते हुए अवन्ति सुन्दरी और बिज्जिका का भी उल्लेख किया और कहा कि प्रसाद जी के काव्य-सामर्थ्य पर उनके शब्द-प्रयोग के आधार पर चिंतन की जो परंपरा कमलेश जी ने शुरू की उसकी एक अपनी महत्ता है। प्रसाद जी की प्रपौत्री कविता प्रसाद ने इस आयोजन की उपलब्धियों को रेखांकित किया और प्रसाद और शिवरानी देवी पर एक साथ विमर्श के औचित्य को भी उनके जीवन-प्रसंगों से स्थापित किया। इस विमर्श-आयोजन को एक नया आयाम मिला, प्रसिद्ध गीतकार श्री सुरेन्द्र वाजपेयी के सम्मोहक काव्य-पाठ से — गिरते हैं पेड़ों से पत्ते हरे-हरे, धूप दिखाकर आग चली जाती है … हवा लगाकर आग चली जाती है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. इंदीवर ने दोनो व्याख्यानों के समाहार के साथ ही प्रसाद जी और शिवरानी देवी देवी के सर्जनात्मक अवदान के महत्त्वपूर्ण आयामों की भी चर्चा की। धन्यवाद ज्ञापन ‘सोच-विचार’ के संपादक नरेन्द्र नाथ मिश्र ने किया। संयोजन और संचालन प्रो. इशरत जहाँ ने किया। इस अवसर पर साहित्यकार डॉ रामसुधार सिंह, शिवकुमार पराग, सुरेंद्र प्रताप सिंह, अशोक कुमार सिंह ,पवन कुमार शास्त्री, चंद्रभाल सुकुमार, बुद्धदेव तिवारी, देवेंद्र पांडेय, कवींद्र नारायण आदि थे।
