विचार गोष्ठी में साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि

 

लमही में प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र द्वारा प्रेमचंद दीपांजलि एवं विचार गोष्ठी का आयोजन

 

वाराणसी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की 89वीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र लमही, वाराणसी के तत्वावधान में “प्रेमचंद दीपांजलि एवं विचार गोष्ठी” का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कवियों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, छात्रों और समाजसेवियों ने प्रेमचंद के साहित्य और विचारों को नमन करते हुए उनके जीवन दर्शन पर विमर्श किया। अध्यक्षता के संरक्षक प्रो. श्रद्धानंद ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रेमचंद जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। प्रो. श्रद्धानंद ने कहा कि “यदि प्रेमचंद नहीं होते, तो हिंदी साहित्य का जन-संवेदनशील स्वरूप अधूरा रह जाता।” उन्होंने साहित्य को समाज का दर्पण बनाया और किसान, मज़दूर, स्त्री तथा वंचित वर्ग की पीड़ा को आवाज़ दी। कंचन सिंह परिहार ने कहा कि प्रेमचंद के बिना हिंदी साहित्य में यथार्थवाद और समाजवादी चेतना की कल्पना अधूरी है। उनकी कालजयी रचनाएँ गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, गबन और सेवा सदन आज भी भारतीय समाज की आत्मा को झकझोरती हैं। साहित्यकार हिमांशु उपाध्याय ने कहा कि प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि वे कलम के सिपाही और समाज सुधारक थे, जिन्होंने लेखन को क्रांति का माध्यम बनाया। काव्यपाठ के क्रम में कवींद्र नारायण, गौतम अरोरा सरस्, बुद्धदेव देव तिवारी, सिद्धनाथ शर्मा, हिमांशु उपाध्याय, डॉ. पुष्पेंद्र अस्थाना, रामजतन पाल और सूर्यदीप कुशवाहा ने प्रेमचंद को समर्पित कविताएँ प्रस्तुत कीं। कवियों ने उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में ग्रामीण व किसान साहित्यकारों, महाविद्यालयों के विद्यार्थियों तथा समाजसेवी राजेश श्रीवास्तव की भी सहभागिता रही। सभी अतिथियों का स्वागत डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम का संचालन आनंद कृष्ण मासूम तथा धन्यवाद ज्ञापन संतोष कुमार प्रीत ने दिया।

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