
वाराणसी।वसंत कन्या महाविद्यालय, कमच्छा, वाराणसी में हिंदी तथा अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में “संवाद : लेखक और लेखनी से” विषय पर एक अत्यंत सारगर्भित और प्रेरणादायी संवाद का आयोजन हुआ। इस अवसर पर साहित्य और सृजनशीलता की शक्ति को केंद्र में रखकर लेखन, संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति पर गहन विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम का निर्देशन हिंदी विभागाध्यक्षा प्रो. आशा यादव और अंग्रेजी विभागाध्यक्षा प्रो. निहारिका लाल ने की। कार्यक्रम के आरंभ में महाविद्यालय की प्रबंधक श्रीमती उमा भट्टाचार्य एवं प्राचार्या प्रो. रचना श्रीवास्तव ने अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया। दीप प्रज्वलन और महाविद्यालय कुलगीत के साथ समारोह का शुभारंभ हुआ, जिससे वातावरण में सृजन और संस्कृति की सुगंध फैल गई। इस संवाद के मुख्य वक्ता रही प्रो. अनुराधा बनर्जी (पूर्व आचार्या, अंग्रेजी विभाग, वसंत कन्या महाविद्यालय) तथा प्रो. अवधेश प्रधान (आचार्य, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय)। दोनों ही विद्वानों ने अपने सशक्त वक्तव्यों में लेखन की प्रक्रिया, संवाद की भूमिका और लेखनी की प्रेरक शक्ति पर सारगर्भित विचार रखे। प्राचार्या प्रो. रचना श्रीवास्तव ने अपने स्वागत भाषण में संवाद के इस विषय को आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक बताया और छात्राओं को रचनाशीलता व आत्म- अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित किया। वहीं, प्रबंधक श्रीमती उमा भट्टाचार्य ने प्रो. अनुराधा बनर्जी के व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हुए छात्राओं से उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आशा यादव ने सभी अतिथियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए कहा कि रचनाशीलता ही साहित्य का हृदय है और सृजनशील मन ही समाज में नए विचारों की धारा प्रवाहित करता है। इसी क्रम में प्रो. चंद्रकला पाड़िया ने कहा कि “कविताएँ मनुष्य की आत्मा को स्पर्श करती हैं और संवेदना का विस्तार करती हैं।” प्रो. अनुराधा बनर्जी ने संवाद और लेखनी के बीच के अंतर्संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “स्वयं का लेखन ही सच्चे साहित्य का प्रारंभ है।” उन्होंने नाटक और कविता को साहित्य का हृदय बताया। वहीं प्रो. अवधेश प्रधान ने अध्यापन और कवि-धर्म को ‘परम धर्म’ बताते हुए कहा कि “कविता मनुष्य के हृदय की आवश्यकता एवम् शुद्धतम रूप है।” इस अवसर पर साहित्यिक रचनाओं के पुस्तक लोकार्पण का भी आयोजन हुआ। इसमें अंग्रेजी विभाग की पूर्व अध्यक्षा डॉ. अनुराधा बनर्जी की पुस्तक “रवीन्द्रनाथ ठाकुर के दो कालजयी नाटक : चित्रांगदा, नटी की पूजा” तथा अंग्रेजी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. पूर्णिमा सिंह की पुस्तक “मिथ, इतिहास और संस्कृति” का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की सांस्कृतिक गरिमा को और बढ़ाया महाविद्यालय की रंगमंच इकाई ने, जिन्होंने डॉ. प्रीति विश्वकर्मा के निर्देशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की “चण्डालिका” पर आधारित एक मनमोहक श्रुतिनाट्य प्रस्तुत किया। इस नाट्य प्रस्तुति का अनुवाद स्वयं प्रो. अनुराधा बनर्जी द्वारा किया गया था, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम के धन्यवाद ज्ञापन की जिम्मेदारी अंग्रेजी विभाग की प्रो. निहारिका लाल ने निभाई। उन्होंने सभी आमंत्रित अतिथियों, प्राध्यापकों और छात्राओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। इस अवसर पर प्रो. कुमुद रंजन, प्रो. शांता चटर्जी, हिंदी और अंग्रेजी विभाग के शिक्षकगण, शोधार्थी तथा अनेक विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. शुभांगी श्रीवास्तव ने किया, जिन्होंने अपनी प्रभावशाली भाषा और गरिमामय अभिव्यक्ति से कार्यक्रम को सुसंयोजित ढंग से आगे बढ़ाया। यह संवाद अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल रहा। इसने उपस्थित सभी श्रोताओं को चिंतन, लेखन और सृजन के नए आयामों से अवगत कराया तथा साहित्यिक अभिव्यक्ति की नयी दिशाओं की ओर उन्मुख किया।
