
वाराणसी। शुक्रवार को अन्तर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र, बीएचयू, वाराणसी में आयोजित पांच दिवसीय ‘एआई-समर्थित शोध : विचार से प्रकाशन तक’ कार्यशाला का अंतिम दिवस रहा।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो० अशुतोष विश्वाल, अधिष्ठाता एवं विभागाध्यक्ष, सीएएसई, एम०एस० विश्वविद्यालय, बड़ौदा, रहे। विशेष अतिथि के रूप में प्रो आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख(शैक्षणिक एवं शोध) उपस्थित रहे।
सत्र की अध्यक्षता प्रो प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, अन्तर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र ने की।
अपने उद्बोधन में प्रो अशुतोष विशाल ने कहा कि एआई जैसी नवोन्मेषी तकनीकें शोध को नई दिशा प्रदान कर रही है। इस प्रकार की सार्थक कार्यशाला आयोजित करने के लिए बधाई दी। प्रो आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख(शैक्षणिक एवं शोध), आईयूसीटीई, वाराणसी ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तनकारी भूमिका निभा रही है जो शोध, नवाचार और प्रौद्योगिकी- आधारित अधिगम को प्रोत्साहित करेगी। अध्यक्षीय उद्बोधन में केंद्र के निदेशक प्रो प्रेम नारायण सिंह ने शोध में नैतिकता, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए प्रतिभागियों को एआई के जिम्मेदार उपयोग के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को कार्यशाला की सफल सहभागिता के लिए बधाई देते हुए कहा कि अन्तर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र देश के शिक्षकों को सशक्त बनाकर समाज को मजबूत बनाने के लिए सतत् रूप से प्रयासरत है।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में प्रो० रमेश शर्मा, भूतपूर्व, निदेशक, इग्नू, नई दिल्ली, ने “शोध आलेख का प्रारूपण : रूपरेखा से प्रथम प्रारूप तक” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने शोध लेखन की चरणबद्ध प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि एआई उपकरणों की सहायता से शोधार्थी अपने विचारों को व्यवस्थित रूपरेखा में ढालकर उच्च गुणवत्ता वाले प्रारूप तैयार कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एआई-सहायता प्राप्त लेखन से शोधार्थियों को विषयवस्तु की स्पष्टता, तार्किकता और भाषाई शुद्धता बनाए रखने में विशेष सहायता मिलती है। इसके पश्चात् प्रो० शर्मा ने “प्लेज़रिज़्म : शोध में एआई का नैतिक एवं जिम्मेदार उपयोग” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने शोध में मौलिकता, बौद्धिक ईमानदारी एवं नैतिकता के महत्व पर बल देते हुए कहा कि एआई का प्रयोग करते समय शोधकर्ताओं को अत्यंत सतर्क रहना चाहिए ताकि अनजाने में भी साहित्यिक चोरी (प्लेज़रिज़्म) की संभावना न रहे। उन्होंने एआई उपकरणों के जिम्मेदार और नैतिक उपयोग के लिए व्यावहारिक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए।
कार्यशाला में देश के 19 राज्यों से 127 शिक्षक एवं शोधार्थियों ने सक्रिय रूप से सहभागिता की। कार्यक्रम का संयोजन डा राजा पाठक और डा दीप्ति गुप्ता द्वारा किया गया।
