
पूर्णिमा महोत्सव में दूसरा दिन
वाराणसी।परमाराध्य परमधर्माधिश ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य में काशी के केदारघाट स्थित श्रीविद्यामठ में पूर्णिमा महोत्सव के द्वितीय दिवस मंगलवार को डॉ दिव्या श्रीवास्तव ने शास्त्रीय विद्या के अंतर्गत अपने सहयोगियों संग विविध कार्यक्रम प्रस्तुत कर उपस्थित भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। शंकराचार्य जी महाराज ने उनके प्रस्तुति पर प्रसन्न होकर उनका उन्मुक्त कंठ से सराहना किया।
महोत्सव के द्वितीय दिवस के कार्यक्रम के आरंभ में नृत्य के माध्यम से देव आह्वान कर संपूर्ण सृष्टि में मंगलमय ऊर्जा के संचार हेतु कामना किया गया।
जिसके अनंतर डॉ दिव्या श्रीवास्तव ने बाबा विश्वनाथ एवं मां भगवती को समर्पित अर्धनारीश्वर स्तुति प्रस्तुत की।यह रचना शिव~शक्ति के अद्वैत स्वरूप का सौंदर्यपूर्ण प्रतीक है जो सृष्टि के संतुलन व समरसता का संदेश देती है।
जिसके पश्चात गौरी कला मंडपम द्वारा रामराज्याभिषेक नृत्यनाटिका की प्रस्तुती दी गई।इसके अंतर्गत लव कुश के माध्यम से राम वनगमन का भावपूर्ण वर्णन प्रस्तुत किया गया।इसके अतिरिक्त केवट प्रसंग,पंचवटी में सुपर्णखा प्रसंग,मारीच का छल एवं सीता हरण,जटायु मोक्ष,हनुमत मिलन एवं अशोक वाटिका प्रसंग,लंका दहन एवं सेतु निर्माण,रावण वध,श्रीराम का अयोध्या आगमन,दीपोत्सव एवं रामराज्याभिषेक आदि विषयों पर नृत्यनाटिका की कलाकारों ने शंकराचार्य जी महाराज के समक्ष प्रस्तुती दी।समस्त नृत्यनाटिका के माध्यम से भक्ति,साहस और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया।
आयोजन के पूर्ण होने पर शंकराचार्य जी महाराज ने समस्त उपस्थित भक्तजनों को आशीर्वचन प्रदान करते हुए उन्हे गौसेवा करने हेतु प्रेरित करते हुए उसके महत्व से अवगत कराया।और कहा कि हमारे जीवन में गुरु व देवी देवताओं का अत्यंत महत्व हैं और उनके प्रति हमारी अनंत श्रद्धा है फिर भी हम लोग अपने घरों में जब भोजन बनाते हैं तब पहली रोटी गौमाता हेतु बनाते हैं।इससे पता चलता है कि हमारे जीवन में गौमाता का कितना महत्व है।
आयोजन के समाप्ति पर शंकराचार्य जी महाराज ने समस्त कलाकारों को आशीर्वाद सहित उपहार व प्रसाद प्रदान किया।
आयोजन में प्रमुख रूप से साध्वी पूर्णांबा दीदी,ब्रम्हचारी परमात्मानंद,हजारी कीर्ति शुक्ला,स्वामी निधिरव्यानंद सागर संजय पाण्डेय आदि लोगों सहित भारी संख्या में भक्तगण उपस्थित थे।
