वाराणसी। शुक्रवार को वसंत कन्या महाविद्यालय, वाराणसी में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) की एक दिवसीय विशेष शिविर का आयोजन ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के अवसर पर बड़े उत्साह और गरिमा के साथ किया गया। इस विशेष आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध शोधकर्ता और वक्ता डॉ गंगेश शाह गोंडवाना (अस्सिटेंट रजिस्ट्रार, आई .आई .टी,काशी हिंदू विश्वविद्यालय) उपस्थित रहे। उनकी उपस्थिति ने पूरे कार्यक्रम को एक विद्वतापूर्ण और प्रेरणादायक वातावरण प्रदान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत एनएसएस स्वयंसेवकों द्वारा प्रस्तुत लक्ष्य गीत से हुई, जिसने पूरे माहौल में ऊर्जा और सामूहिकता का भाव जागृत किया। इस गीत ने शिविर के उद्देश्य और एनएसएस की सामाजिक चेतना को प्रभावी रूप से व्यक्त किया।

प्राचार्या प्रोफेसर रचना श्रीवास्तव ने स्वागत वक्तव्य देते हुए बाल दिवस एवं राष्ट्रीय जनजातीय दिवस के अवसर पर सभी को बधाई और शुभकामनाएं दी।

शालिनी गुप्ता स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा ने राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर भाषण की प्रस्तुति दी। इसके पूर्व जनजाति गौरव दिवस विषय पर निबंध प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।

मुख्य अतिथि श्री गंगेश शाह ने अपने उद्बोधन में एनएसएस अधिकारी डॉक्टर शुभांगी श्रीवास्तव तथा इतिहास विभाग के प्रोफेसर शशिकेश कुमार गोंड के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एनएसएस युवाओं में सेवा भावना, नेतृत्व कौशल और सामाजिक ज़िम्मेदारी का विकास करती है, जो राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अपने विस्तृत भाषण में उन्होंने आदिवासी संस्कृतियों, विशेषकर गोंड और भील समुदायों, पर गहन चर्चा की। उन्होंने बताया कि गोंड दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जनजातियों में से एक है, जिसकी सांस्कृतिक विरासत, कला, भाषा और जीवन पद्धति अत्यंत समृद्ध है। उन्होंने ‘गोंड’ शब्द के अर्थ, उनकी लोकपरंपराओं, मिथकों और प्रकृति केंद्रित जीवन दर्शन को विस्तार से समझाया। उन्होंने गोंड कला विशेषकर गोंड चित्रकला का महत्व भी बताया, जो आज विश्व स्तर पर सराही जाती है।

मुख्य अतिथि ने अपनी प्रस्तुति में सिंधु लिपि के इतिहास, उसकी जटिलता और उसके संभावित अर्थों पर रोचक जानकारी दी। उन्होंने सिंधु सभ्यता के प्रतीकों, लेखन शैली और इनके माध्यम से प्रकट होने वाले सामाजिक संकेतों को सरल शब्दों में समझाया। यह विषय विद्यार्थियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ और प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रति उनकी समझ को विस्तृत किया।

इसके बाद उन्होंने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों बिरसा मुंडा, रघुनाथ शाह और शंकर शाह के योगदान को विशेष रूप से याद किया। उन्होंने बताया कि इन नायकों ने ब्रिटिश दमनकारी नीतियों के विरुद्ध सशक्त संघर्ष किया और अपने अद्वितीय साहस, आत्मसम्मान एवं सांस्कृतिक गौरव के कारण इतिहास में अमर हो गए। आदिवासी आंदोलनों में इन नेताओं की भूमिका सामाजिक न्याय और स्वाधीनता की संघर्षगाथा का महत्वपूर्ण अध्याय है।

अपने संबोधन में श्री गंगेश शाह ने मानव मूल्यों और नैतिकता की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति के साथ सामंजस्य, सामूहिकता, सरलता और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देता है। आज के समय में इन मूल्यों का पुनर्स्मरण और संरक्षण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही मूल्य समाज को संतुलन और स्थायी विकास की दिशा में ले जाते हैं।

कार्यक्रम की समाप्ति एक गरिमा मयी वातावरण में हुई, जहां विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों ने आदिवासी संस्कृति, इतिहास और सभ्यता के प्रति गहरा सम्मान अनुभव किया।

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