वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र विभाग द्वारा फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, संवत् 2082 (ईस्वी सन् 2026) के अवसर पर होलिका पर्व के संबंध में शास्त्रीय, ज्योतिषीय एवं धर्मशास्त्रीय प्रमाणों के समन्वित परीक्षण के उपरांत अधिकृत निर्णय जारी किया गया है।
यह निर्णय जनसामान्य की धार्मिक सुविधा एवं शास्त्रसम्मत आचरण के उद्देश्य से प्रकाशित किया जा रहा है।
जारी निर्णय के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तिथि 02 मार्च 2026 को सायं 5:56 बजे से प्रारंभ होकर 03 मार्च 2026 को सायं 5:08 बजे तक विद्यमान रहेगी तथा 03 मार्च को सूर्योदय पूर्णिमा में ही होगा। धर्मशास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है- “भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा” -अर्थात् श्रावणी एवं फाल्गुनी पूर्णिमा में भद्रा काल में दहनादि कृत्य वर्जित है।
निर्णयसिन्धु में उल्लिखित है- “निशीथोत्तरं भद्रासमाप्तौ भद्रामुखं त्यक्त्वा भद्रायामेव” -अर्थात् भद्रा के मुख का त्याग कर निशीथोत्तर काल में दहन करना चाहिए। धर्मसिन्धु में भी निर्देश है-“एवं रात्रौ होलिकोत्सवं कृत्वा प्रातः प्रतिपद्यां स्नानं कुर्यात्”।
उपर्युक्त प्रमाणों एवं स्थानीय पंचांग के आधार पर विश्वविद्यालय के विद्वानों ने निर्णय दिया है कि होलिका पूजन एवं दहन 03 मार्च 2026 (मंगलवार) को प्रातः 3:24 बजे से 5:33 बजे तक (भद्रा पुच्छ, निशीथोत्तर काल) किया जाना शास्त्रसम्मत एवं प्रशस्त होगा।
उल्लेखनीय है कि 03 मार्च 2026 को सायंकाल चंद्रग्रहण होने के कारण प्रातः 9:00 बजे से सूतक काल आरंभ होगा। धर्मशास्त्रीय मर्यादा के अनुसार ग्रहणदिने सामान्य उत्सवों का निषेध माना गया है। अतः सायंकालीन दहन या उत्सव शास्त्रानुकूल नहीं है।
अतः होलिका भस्म धारण एवं धूलिवंदन (होली उत्सव) 04 मार्च 2026 (बुधवार) को प्रतिपदा तिथि में, जो अपराह्न तक विद्यमान रहेगी, मनाया जाना शास्त्रोचित होगा।
विश्वविद्यालय ने इस अवसर पर होलिका पर्व के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व पर भी प्रकाश डाला है। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म तथा अहंकार पर भक्ति की विजय का प्रतीक है। प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा एवं दैत्यराज हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के अंत का प्रसंग यह संदेश देता है कि ईश्वरनिष्ठा और सत्य की शक्ति अंततः विजयश्री प्रदान करती है।
सामाजिक दृष्टि से होली समरसता, बंधुत्व और सामाजिक एकात्मता का पर्व है, जिसमें समस्त भेदभावों से ऊपर उठकर समाज प्रेम और सौहार्द का उत्सव मनाता है। सांस्कृतिक रूप से यह वसंतागमन का महोत्सव है, जो भारतीय लोकगीतों, फाग, होरी एवं विविध क्षेत्रीय परंपराओं के माध्यम से राष्ट्र की सांस्कृतिक विविधता को अभिव्यक्त करता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से होलिका दहन अंतःकरण की शुद्धि का प्रतीक है यह हमारे भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार जैसे दुर्गुणों के दहन का संदेश देता है तथा भस्म धारण जीवन की अनित्यता और संयमित आचरण का स्मरण कराता है।
विश्वविद्यालय परिवार ने समस्त श्रद्धालुजन से अपील की है कि वे होलिका पर्व को शास्त्रसम्मत तिथि एवं मुहूर्त में मर्यादापूर्वक सम्पन्न करें तथा उसके आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संदेश को आत्मसात् करते हुए समाज में सद्भाव, संयम एवं समरसता का वातावरण सुदृढ़ करें।
