वाराणसी। साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास द्वारा पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित ‘हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत जिला राजकीय पुस्तकालय में एक महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध समीक्षक शांतिप्रिय द्विवेदी के साहित्यिक अवदान पर नरेंद्र नाथ मिश्र तथा नवगीत के प्रणेता डॉ शंभू नाथ सिंह के योगदान पर डॉ. भुवनेश्वर द्विवेदी ने विस्तार से विचार व्यक्त किए। शांतिप्रिय द्विवेदी के कृतित्व को रेखांकित करते हुए नरेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि वे सही अर्थों में सर्वहारा साहित्यकार थे। यद्यपि उनकी पहचान मुख्यतः निबंधकार और छायावादी समीक्षक के रूप में रही, किंतु वे समर्थ कवि, उपन्यासकार, संस्मरणकार एवं आत्मकथाकार भी थे। छायावादी कविता पर उनकी गहरी पकड़ थी। स्वतंत्रता-पूर्व के दो दशकों में छायावाद को लेकर जो जनसामान्य में ऊहापोह की स्थिति थी, उसमें उनका हस्तक्षेप अत्यंत सशक्त और प्रभावी रहा। डॉ. भुवनेश्वर द्विवेदी ने डॉ. शंभू नाथ सिंह को नवगीत का ध्वजवाहक बताते हुए कहा कि जब-जब नवगीत या लोकधर्मी काव्य की चर्चा होगी, उनका नाम अनिवार्य रूप से लिया जाएगा। उनके बिना नवगीत के प्रारूप का चित्रण संभव नहीं है। वे नवगीत के प्रणेता और संवाहक पुरुष थे। उनका साहित्य भारतीय हिंदी साहित्य को गहराई से प्रभावित करता है। अनुशासन और मर्यादा से युक्त उनका लेखन जीवन-मूल्यों की समझ प्रदान करता है। उन्होंने केवल स्वयं सृजन नहीं किया, बल्कि नवगीत और नवगीतकारों की नई पीढ़ी को दिशा देकर उन्हें प्रतिष्ठा दिलाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शशिकला त्रिपाठी ने कहा कि ऐसे आयोजन भूले-बिसरे साहित्यकारों को स्मरण करने और उनके कृतित्व पर गंभीर चिंतन का ऐतिहासिक कार्य करते हैं। यह विडंबना है कि जो रचनाकार पाठ्यक्रम में शामिल नहीं होते, उनसे हिंदी पाठक वर्ग जुड़ नहीं पाता। छायावाद पर सशक्त समीक्षाएं लिखने के बावजूद शांतिप्रिय द्विवेदी को अपेक्षित महत्व नहीं मिल सका। वहीं डॉ. शंभू नाथ सिंह ने गीत और कविता के साथ-साथ गद्य में भी महत्वपूर्ण लेखन किया है। इन दोनों रचनाकारों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। विशिष्ट अतिथि डॉ. राजीव कुमार सिंह ने अपने पिता डॉ. शंभू नाथ सिंह की साहित्य सेवा का उल्लेख करते हुए उनके सृजन कर्म के कई प्रसंग साझा किए और कहा कि उन्होंने नवगीत तथा नवगीतकारों की अगली पीढ़ी का नेतृत्व किया। प्रारंभ में विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्रा ने स्वागत भाषण में कहा कि हिंदी धरोहर की इस यात्रा का यह एकादश पुष्प है और विश्वास है कि यह क्रम आगे भी निरंतर चलता रहेगा। सरस्वती वंदना पंडित सिद्धनाथ शर्मा ने प्रस्तुत की। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राम सुधार सिंह ने किया तथा संचालन सुनील नारायण उपाध्याय ने किया।

समारोह में आनंद कृष्ण ‘मासूम’ ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर शिवकुमार पराग, अत्रि भारद्वाज, कविंद्र नारायण, हिमांशु उपाध्याय, पवन कुमार, संतोष प्रीत, आनंद मासूम, देवेंद्र पांडेय, छाया शुक्ला, गौतम अरोड़ा, सरस सुरेंद्र वाजपेई, उषा पांडेय, अरुण केसरी, वात्सला सहित अनेक कवि एवं साहित्यकार उपस्थित रहे।

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