वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अक्सर भारतीय नेतृत्व द्वारा यह वक्तव्य अक्सर दोहराया जाता है कि “भारत बुद्ध का देश है, युद्ध का नहीं।” यद्यपि यह कथन शांति स्थापना की दृष्टि से एक बार तो सुखद प्रतीत होता है, किंतु भारतीय वांग्मय, इतिहास और आध्यात्मिक दर्शन की गहराई में उतरने पर यह सत्य एकांगी और अपूर्ण सिद्ध होता है।

जब समाज में पशुबलि और कर्मकांडों के नाम पर पाखंड बढ़ गया था, तब बुद्ध का प्राकट्य हुआ। उनके अवतार का एक विशिष्ट प्रयोजन था। उन्होंने उस समय की जड़ता को तोड़ने के लिए अहिंसा का मार्ग दिखाया।

किंतु, बुद्ध के मार्ग को ही भारत की एकमात्र पहचान मान लेना, उस ‘यज्ञीय संस्कृति’ का तिरस्कार है जो इस राष्ट्र का आधार है। भारत साकार और निराकार दोनों की उपासना का केंद्र रहा है। यहाँ की मूर्ति-पूजा, मंदिर और यज्ञ कोई ‘कोरी कल्पना’ या अंधविश्वास नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सोपान हैं। यह ‘यज्ञ भूमि’ है, जहाँ आहुति के माध्यम से समष्टि का पोषण होता है।

युद्ध भी एक धर्म है

यदि भारत केवल बुद्ध (अयुद्ध) का देश होता, तो भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘अहिंसा’ का पाठ पढ़ाते। इसके विपरीत, गीता का संपूर्ण उपदेश अर्जुन की नपुंसकता और मोह को नष्ट कर उसे शस्त्र उठाने के लिए प्रेरित करने हेतु है।

सनातन व्यवस्था में जिन 37 सामान्य धर्मों का वर्णन है, उनमें ‘युद्ध’ को एक अनिवार्य धर्म माना गया है। यह युद्ध विस्तारवाद के लिए नहीं, बल्कि ‘आततायी’ के विनाश और ‘धर्म संस्थापना’ के लिए है।

जब राष्ट्र के कर्णधार इसे केवल ‘बुद्ध का देश’ कहते हैं, तो वे अनजाने में उस ‘योगेश्वर’ की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं जिन्होंने कहा था— “तस्मात् युध्यस्व भारत” (इसलिए हे भरतवंशी, युद्ध कर)। युद्ध से विमुख होना गीता के दर्शन का अपमान है।

भारत का इतिहास केवल मठों और विहारों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उन प्रतापी राजाओं और ऋषियों का इतिहास है जिन्होंने शास्त्र के साथ ‘शस्त्र’ की महत्ता को स्वीकारा।

अपने अस्तित्व और संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ा गया युद्ध ही वह कारण है कि आज भारत की सनातन पहचान जीवित है। यदि हम केवल बुद्ध के मार्ग पर चलते, तो आक्रांताओं के समक्ष हमारा अस्तित्व बहुत पहले समाप्त हो गया होता।

भारत ‘शक्ति’ का उपासक है। हमारे देवता भी आयुध (शस्त्र) धारण करते हैं। यहाँ शांति का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि सामर्थ्यवान की क्षमा है।

भारत को केवल ‘बुद्ध का देश’ कहना इसकी उस प्रचंड ऊर्जा को नकारना है जो अन्याय के विरुद्ध सिंहनाद करती है। यहाँ यदि बुद्ध की करुणा है तो भगवान श्री कृष्ण का सुदर्शन भी है। यह राष्ट्र तब पूर्ण होता है जब इसमें शांति और शौर्य, यज्ञ और युद्ध, तथा शास्त्र और शस्त्र का समन्वय होता है।

अतः नेतृत्त्वकर्ताओं को यह समझना चाहिए कि भारत की आत्मा केवल ‘शांति’ में नहीं, बल्कि ‘न्याययुक्त युद्ध’ में भी बसती है। यह देश उस सनातन संस्कृति का है जहाँ अधर्म के नाश के लिए युद्ध को ही ‘परम धर्म’ माना गया है।

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