
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के इस पावन अवसर पर, जब हम सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमें उस ‘नारी शक्ति’ के अस्तित्व और उसकी आंतरिक सामर्थ्य पर चर्चा करनी होगी।
आज के इस आधुनिक दौर में भी बहुत सी महिलाएं अपने वजूद और पहचान के लिए संघर्ष कर रही हैं। हमें यह समझना होगा कि सशक्तिकरण कोई बाहरी उपहार नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर से उपजी एक ‘पहल’ है। यदि एक महिला स्वयं अपनी लड़ाई लड़ने के लिए खड़ी नहीं होती और अपना निर्णय खुद लेने का साहस नहीं दिखाती, तो समाज या व्यवस्था उसके लिए कुछ भी नहीं कर पाएगी। एक महिला केवल परिवार की धुरी नहीं होती, बल्कि वह पूरे समाज की मार्गदर्शक और चेतना होती है।
सोनभद्र के दुर्गम क्षेत्रों में बिताए मेरे 8 वर्ष और आकाशवाणी वाराणसी में 12 वर्षों का अनुभव मुझे यही सिखाता है कि जब महिला अपनी बहुआयामी भूमिका को पहचानकर स्वयं नेतृत्व संभालती है, तभी वास्तविक परिवर्तन आता है।
एक बार जब महिला अपने अस्तित्व को पहचान कर आत्मनिर्भर होने का संकल्प ले लेती है, तब बारी आती है आधुनिक साधनों की। आज का युग एक बहुत बड़ा डिजिटल संक्रमण काल है। यहां डिजिटल साधन हमारे लिए एक ‘एक्सेलेरेटर’ की तरह काम करते हैं। जो कार्य हम सामान्य गति से करते हैं, ये साधन हमारी उस सोच और मेहनत को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
तकनीक हमारी मानवीय क्षमताओं को दोगुनी-तिगुनी रफ्तार देने का सामर्थ्य रखती है। विज्ञान ए.आर.पी. के रूप में मेरा लक्ष्य यही है कि हमारी बेटियां और बच्चे केवल इन साधनों के ‘उपभोक्ता’ बनकर न रहें, बल्कि इसके माध्यम से अपनी प्रतिभा को वैश्विक मंच पर पहुंचाएं।
यही वह विज़न है जिसे हमें ‘विकसित भारत 2047’ के लिए अपने बच्चों में विकसित करना है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे किसी पर निर्भर रहने वाले ‘रोजगार चाहने वाले’ न बनें, बल्कि तकनीक की शक्ति का उपयोग कर ‘रोजगार देने वाले’ बनें।
वे ‘लोकल’ संसाधनों से अपनी खुद की चीजें और पहचान जनरेट करें। ज्ञान,तार्किकता के साथ जब हम अपनी युवा पीढ़ी को इन डिजिटल साधनों से जोड़ेंगे, तभी एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा।
अंततः, पहले हमें खुद को पहचानना होगा, अपनी आवाज़ को बुलंद करना होगा, और फिर तकनीक के पंख लगाकर सफलता के आसमान को छूना होगा।सशक्तिकरण का पहला कदम ‘स्वयं की पहचान’ है, और दूसरा कदम ‘साधनों का सही चुनाव’। जब नारी अपनी शक्ति पहचान लेती है, तो तकनीक उसके सपनों को उड़ान देने का जरिया बन जाती है।”
रश्मि त्रिपाठी , ए पी आर विज्ञान, चिरईगांव, वाराणसी
