वाराणसी।वसंत कन्या महाविद्यालय में महिला अध्ययन प्रकोष्ठ एवं युवा समिति के संयुक्त तत्वावधान में संचालित छह दिवसीय लिंग- संवेदनशीलता अनुसंधान कार्यशाला कार्यक्रम के अंतर्गत अंतिम दिवस, मंगलवार को अद्भुत व भव्य समापन समारोह का आयोजन किया गया।

इस सत्र में ‘लिंग-संवेदनशील अनुसंधान में नैतिक विचार’ विषय पर विचार- विमर्श किया गया। कार्यशाला के सफल आयोजन के लिए प्राचार्या प्रोफेसर रचना श्रीवास्तव ने शुभकामनाएं दी।

कार्यक्रम का आरंभ कार्यकारी प्राचार्या डॉ.शांता चैटर्जी के उद्बोधन से हुआ।

जिन्होंने स्त्री की सर्व व्यापकता, शक्ति और संभावनाओं पर अपने विचार व्यक्त किये।

कार्यक्रम के समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रोफेसर कल्पलता पाण्डेय( पूर्व अध्यक्ष, शिक्षा संकाय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) की गौरवान्वित उपस्थिति रही।

जिन्होंने अपने ज्ञानवर्धन वक्तव्य में स्त्री के अधिकार व अस्तित्व पर अपने विचार रखें। उन्होंने कहा कि लिंग समानता को समझने और प्रभावी नीतियाँ बनाने के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक अनुसंधान दोनों की आवश्यकता होती है। मात्रात्मक शोध के माध्यम से हम आंकड़ों के आधार पर यह जान सकते हैं कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति क्या है? जबकि गुणात्मक शोध हमें उनके अनुभवों, चुनौतियों और सामाजिक व्यवहार को गहराई से समझने में सहायता करता है। इन दोनों प्रकार के शोध के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि लिंग भेद किन-किन क्षेत्रों में मौजूद है और उसे किस प्रकार कम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी जोड़ा की आज जरूरत स्त्री को कोमल व सुशील बनाने की नहीं है बल्कि, उसके पंखों में तमाम रंग भरकर उसे उड़ान देने की है और कहा कि सशक्तिकरण कोई बाहरी व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता है बल्कि यह स्त्री के भीतर ही मौजूद है, जिसे वह अपने प्रयासों से बाहर निकाल सकती है।

इसी क्रम में प्रोफेसर अरविंद कुमार जोशी ( काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष) ने महिलाओं के महत्व, परिवार और समाज में बराबरी पर अपने विचार व्यक्त किये।

उन्होंने बताया कि महिलाएँ केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी आधारशिला होती हैं। वे माँ, बहन, पत्नी और कार्यकर्ता के रूप में समाज के हर क्षेत्र में योगदान देती हैं।

महिलाओं का महत्व परिवार के पुरुष के बराबर ही है, बल्कि कई बार उससे अधिक भी होता है, क्योंकि वे भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

फिर भी, पितृसत्तात्मक सोच के कारण महिलाओं को अक्सर द्वितीय श्रेणी का नागरिक माना जाता है। यह सोच न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि समाज के समग्र विकास में भी बाधक है।

इसी क्रम में बिंदा परांजपे ( आचार्या, पूर्व अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान संकाय) ने अतीत से वर्तमान तक स्त्रियों की दशा का मूल्यांकन किया।

कार्यक्रम के समापन में प्रबंधिका ‘उमा भट्टाचार्य’ ने आशीर्वचन दिया ।उन्होंने बताया कि स्त्री की प्रगति पुरुष से तुलना करने में नहीं बल्कि अपने शक्तियों को पहचान कर खुद को सशक्त बनने में है।

कार्यशाला का सफलतापूर्वक संयोजन डॉ अनुराधा बापुली तथा संचालन डॉ प्रतिमा द्वारा किया गया, डॉ. श्वेता सिंह (आचार्या, इतिहास विभाग) ने छ: दिवसीय कार्यक्रम के रिपोर्ट का वाचन किया। और सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किया गया।

इस अवसर पर कार्यशाला के आयोजन समिति के सदस्य जिनमें डॉ. प्रियंका, डाॅ. शशिकेश, डॉ. मालविका, डॉ. शुभांगी , डॉ अनु सिंह आदि उपस्थित रहे।

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