
भगवान महावीर जयंती का पावन पर्व हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह हमारे जीवन के भीतर झांकने और आत्म-मंथन करने का एक क्षण है। आज जब विश्व चारों ओर से तनाव, संघर्ष और असहिष्णुता से घिरा हुआ है, तब भगवान महावीर का दर्शन एक शीतल छाया के समान प्रतीत होता है। उनके द्वारा दिए गए दो प्रमुख सिद्धांत—अहिंसा और अनेकांतवाद—मानव जाति के लिए आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सदियों पहले थे।
अहिंसा: करुणा का सर्वोच्च शिखर
सामान्य अर्थों में अहिंसा को केवल शारीरिक रूप से किसी जीव को चोट न पहुँचाने तक सीमित मान लिया जाता है। परंतु भगवान महावीर की अहिंसा अत्यंत सूक्ष्म और गहरी है। यह केवल कर्म की नहीं, बल्कि मन और वचन की भी है।
किसी के प्रति मन में द्वेष पालना या अपनी वाणी से किसी के हृदय को छलनी कर देना भी हिंसा है। ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि इस सृष्टि में एक छोटे से कण से लेकर विशालकाय जीव तक, सभी का अस्तित्व समान रूप से महत्वपूर्ण है। जब हम इस करुणा को अपने भीतर उतार लेते हैं, तो हमारा जीवन स्वतः ही शांत और निर्मल हो जाता है।
अनेकांतवाद: विचारों की सहिष्णुता
यदि अहिंसा हमारे व्यवहार को शुद्ध करती है, तो ‘अनेकांतवाद’ हमारे विचारों को। आज के युग में अधिकांश विवादों की जड़ यह हठ है कि “केवल मेरा ही विचार सत्य है।” अनेकांतवाद इस अहंकार को जड़ से समाप्त करता है।
यह सिद्धांत हमें बताता है कि सत्य अनंत है और उसके कई पहलू हो सकते हैं। जो विचार हमें गलत लग रहा है, वह किसी दूसरे दृष्टिकोण से सत्य हो सकता है। अनेकांतवाद हमें दूसरों की बातों को धैर्य से सुनने, समझने और उनके दृष्टिकोण का सम्मान करने की वैचारिक उदारता प्रदान करता है।
निष्कर्ष
भगवान महावीर का मार्ग किसी को हराने का नहीं, बल्कि स्वयं को जीतने का मार्ग है। यदि हम अपने दैनिक जीवन में थोड़ी सी भी अहिंसा और विचारों में अनेकांतवाद को अपना लें, तो न केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन में शांति आएगी, बल्कि यह समाज और विश्व भी एक सुंदर परिवार बन जाएगा।
आइए, इस महावीर जयंती पर हम अपने मन, वचन और कर्म से इन सिद्धांतों को जीने का संकल्प लें।
महेंद्र राज लूणावत
अध्यक्ष
जैन मिलन जोधपुर
