
विद्या परिषद् के निर्णयों में खुले नवाचार और अनुसंधान के द्वार- कुलपति
वाराणसी।सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में कुलपति प्रो० बिहारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में योगसाधना केन्द्र में विद्या परिषद् की महत्वपूर्ण बैठक में विश्वविद्यालय के शैक्षिक, अनुसंधानात्मक एवं सांस्कृतिक उन्नयन से जुड़े प्रमुख प्रस्तावों पर गहन विचार-विमर्श करते हुए उन्हें समेकित रूप में स्वीकृति प्रदान की गई।
यह निर्णय विश्वविद्यालय को ज्ञान-संरक्षण, अध्यापक शिक्षा तथा अनुसंधान उत्कृष्टता के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान करने वाला सिद्ध होगा।
बैठक का प्रमुख आधार भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (भारत सरकार का जनजातीय कार्य मंत्रालय) के साथ प्रस्तावित संयुक्त समझौता ज्ञापन रहा।
ज्ञातव्य हो कि मंत्रालय द्वारा प्रेषित प्रस्ताव पर विद्या परिषद् ने अपनी सहमति एवं स्वीकृति प्रदान की, तथा यह निर्णय लिया गया कि इस प्रस्ताव के आधार पर शीघ्र ही विधिवत् प्रक्रिया के अनुसार समझौता सम्पन्न किया जाएगा। इस समझौते का उद्देश्य जनजातीय समुदायों की समृद्ध ज्ञान परंपराओं, भाषाओं, लोककलाओं, पारंपरिक जीवन-पद्धति एवं सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, पुनर्जीवन और शैक्षिक संस्थानीकरण करना है। इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय द्वारा उपाधि-पत्र एवं प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम संचालित किए जाएंगे, जिनसे ज्ञान संरक्षण के साथ-साथ कौशल विकास, आत्मनिर्भरता एवं आजीविका संवर्धन को भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा।
इसी क्रम में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग),आईयूसीटीई (अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र) जो कि स्वायत संस्था है इसके शैक्षणिक एवं शोध समझौते प्रस्ताव को भी विद्या परिषद् ने अनुमोदित किया। यह स्पष्ट किया गया कि आईयूसीटीई एक स्वायत्त संस्था है इसके साथ अध्यापक शिक्षा, शोध, पाठ्यक्रम निर्माण एवं मूल्यांकन प्रणाली में स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय मानकों के अनुरूप कार्य करेगा। इस केन्द्र को विद्या-वाचस्पति कार्यक्रमों के संचालन, शोध की गुणवत्ता संवर्धन तथा बहुविषयक शैक्षिक संवाद को प्रोत्साहन प्राप्त होगा।
इन दोनों प्रस्तावों के समेकित आधार पर यह प्रतिपादित किया गया कि विश्वविद्यालय एक ओर जनजातीय ज्ञान परंपराओं को संरक्षित कर उन्हें शैक्षिक मुख्यधारा से जोड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वायत्त अध्यापक शिक्षा केन्द्र के माध्यम से अनुसंधान एवं शिक्षण की गुणवत्ता को उच्चतम स्तर तक विकसित करने का संकल्प भी ले रहा है। यह पहल परंपरा और आधुनिकता के संतुलित समन्वय का सशक्त प्रतिरूप है।
इस अवसर पर कुलपति प्रो० बिहारी लाल शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का ध्येय भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के साथ-साथ उसे समकालीन शिक्षा प्रणाली से जोड़ना है। जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ प्रस्तावित समझौता प्रस्ताव हमारी सांस्कृतिक विविधता को सशक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जबकि यूजीसी के द्वारा संचालित अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र, वाराणसी से करार से अध्यापक शिक्षा एवं अनुसंधान में उत्कृष्टता, नवाचार और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी। यह दोनों पहल मिलकर विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान प्रदान करेंगी।
विद्या परिषद् के इन निर्णयों को कुलपति के दूरदर्शी नेतृत्व में एक उत्कृष्ट, युगानुकूल एवं समन्वित पहल के रूप में देखा जा रहा है, जो शिक्षा, संस्कृति और अनुसंधान के त्रिवेणी संगम को साकार करती है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान-प्रधान दृष्टिकोण एवं भारतीयता-आधारित ज्ञान संरचना को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगी।
इस महत्वपूर्ण बैठक में विश्वविद्यालय के अनेक वरिष्ठ प्राध्यापक एवं अधिकारीगण कुलसचिव राकेश कुमार, परीक्षा नियंत्रक दिनेश कुमार, प्रो० जितेन्द्र कुमार, प्रो० रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो० विधु द्विवेदी, प्रो० शैलेश कुमार मिश्र, प्रो० रमेश प्रसाद, प्रो० महेन्द्र पांडेय, प्रो० अमित कुमार शुक्ल एवं डॉ० विशाखा शुक्ला, डॉ दिव्य चेतन ब्रह्मचारी सहित अन्य गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे, जिनकी सहभागिता से सभी प्रस्तावों को सर्वसम्मति से स्वीकृति प्रदान की गई।
